विडम्बना : भाग-२..
जिन हाथों में वह
अपने सुहाग के
नाम की चूड़ियां
पहनती थी, उन्ही
हाथों से उसने
अपने पति की
चिता को अग्नि
दी.चिता की
लाल अग्नि में
उसकी चूड़ियों का
रंग भी समा
गया.अपने बच्चों
को छाती से
चिपकाए चिता के
ठन्डे होने तक
वह वहीँ बैठी
रही.पति की
चिता तो ठंडी
हो गयी, लेकिन
उसका(पत्नी) ह्रदय जल उठा.जलते ह्रदय
और बुझते सपनों
को लेकर बच्चों
के साथ वो
घर निकल पड़ी.घर की
चौखट पर पैर
रखते ही उसे
यादों ने जकड़
लिया.वह चौखट
पर ही गिर
पड़ी.लेकिन अब
उसे सहारा देने
वाला कोई नहीं
था.
रात उसकी चौखट
पर ही बीती.सुबह बच्चों
के रोने की
आवाज़ से उसकी
नींद खुली.कुछ
सचेत अवस्था में
आने पर उसे
समझ आया कि
अब उसे ही
बच्चों को पालना
है.वह कुछ
सोच में पड़
गयी.उसने शहर
जाकर कुछ काम
करने का तय
किया.लेकिन उसके
पास शहर जाने
के क्या, खाना
खाने तक के
पैसे नहीं थे.खेत और
पालतू जानवर तो
पहले ही बिक
चुके थे.सो,
वह साहुकार के
पास अपना घर
गिरवी रख और
कुछ पैसे लेकर
अपने ३ साल
के लड़के और
५ साल की
लड़की को लेकर
शहर निकल पड़ी.
जैसे ही वह
शहर पहुंची, भीड़-भाड़ और
गाड़ियों कि रेलमपेल
देख घबरा गयी.यहाँ उसका
कोई परिचित ना था,रहने का
कोई ठिकाना ना
था.लोगों की
चुभती नज़रों से
उसे डर लगने
लगा.वह हताश
होकर एक मंदिर
में बैठ गयी.भगवान से प्रार्थना
करने लगी.तभी
मंदिर के पुजारी
ने उसे देखा
और उससे बात
की.पुजारी भला
मानुष था.उसे
उस पर दया
आयी.पुजारी ने
उसे एक घर
में नौकरानी का
काम दिलवा दिया.
काम मिलने पर वह
थोड़ी खुश हुई.उसे रहने
को कमरा मिला.पगार भी
ठीक-ठाक मिलने
लगा.समय कुछ
अच्छा गुजरने लगा.वह अपनी
बेटी को स्कूल
भेजने लगी.उसके
जलते हुए ह्रदय
को अब कुछ
ठंडक मिलने लगी
थी.बुझते हुए
सपनों को उम्मीदों
की चिंगारी लगने
लगी थी.लेकिन
भाग्य को उसकी
यह छोटी सी
ख़ुशी मंज़ूर ना
थी.उसके मालिक
ने एक दिन
मौका पाकर उस
पर बलात्कार किया.वह चीखी,
रोई, गिड़गिड़ाई.लेकिन
उस क्रूर मालिक
ने उसकी एक
ना सुनी.वह
अपनी इज़्ज़त बचा
ना सकी.जैसे-तैसे वह
बच्चों को लेकर
वहां से भागी.
अब वह पूरी
तरह से टूट
चुकी थी.वह
हताशा और निराशा
से घिर चुकी
थी.वह बस
सड़क पर चलती
जा रही थी.उसे कुछ
समझ नहीं आ
रहा था, कि
वो कहाँ जा
रही थी? अपने
बच्चों को कैसे
पालेगी?
चलते -चलते रात
हो चुकी थी.वह थक
चुकी थी.शहर
की एक व्यस्त
गली में एक
इमारत के पास
पहुंच वह ज़मीन
पर ही बैठ
गयी.आसपास की
भीड़ देख उसे
समझ आया कि
वो कहाँ पहुंच
गयी थी? अब
उसे पैसे कमाने
का तरीका मिल
गया था.
उसने मन ही
मन कुछ तय
किया.फिर अपने
सोते हुए बच्चों
को एक अनाथालय
में छोड़ वह
उस इमारत में
चली गयी.उस
इमारत में वैश्यालय
था.अपनी इज़्ज़त
को बेच वह
बच्चों की खुशियां
खरीदना चाहती थी.
कितनी ही स्त्रियां
गावों को छोड़
शहरों में आती
है.मजबूरी में
वेश्यावृत्ति, मजदूरी और ना
जाने क्या-क्या
करती है? खुद
का पेट भरे
ना भरे, अपनी
परिवार का पेट
भरने के लिए
किसी भी हद
तक चली जाती
है.ऐसी स्त्रियां
तो आदरणीय होती
है.लेकिन समाज
इन्हें तिरस्कृत करता है.इन पर
अत्याचार करता है.
यह विडम्बना ही है
हमारे तथा-कथित
सभ्य समाज की.
श्री गुरुदेव दत्त....