Sunday, November 20, 2016

पत्थर! बड़े ही कठोर होते है ये पत्थर.

जूनागढ़ किल्ला | बीकानेर




पत्थर! बड़े ही कठोर होते है ये पत्थर.

कितना कुछ देख लेते है? कितना कुछ सह लेते है? बिना किसी शिकायत के.
ख़ामोशी से चीखें सुन लेते है, रक्तपात देख लेते है.
किसी की जीत, तो किसी की हार
किसी की ख़ुशी, तो किसी के ग़म को अपना लेते है.
सदियों से यही चलता आया है और चलता रहेगा.
लेकिन ये पत्थर! हाँ, ये पत्थर.. कभी विचलित नहीं होते.
खड़े है स्थिर, अपनी नींव जमा कर. 
क्या इन्हें भी ख़ुशी होती होगी? दुःख होता होगा? 
नहीं..ऐसा कैसे हो सकता है? ये पत्थर तो अजीव होते है.
ये कैसे अपनी भावनाएं प्रकट कर सकते है?
लेकिन..ख़ुद टूट कर ये संसार को सजीव कर जाते है.
तो क्या यह उनकी भावना नहीं है?
यदि है..तो फिर ये कुछ कहते क्यों नहीं? या कहना नहीं चाहते?

ना जाने क्यों ये पत्थर बड़े ही कठोर होते है..


श्री गुरुदेव दत्त....


Monday, September 19, 2016

हिमालय और मैं..

करीब २० वर्षों बाद फिर से हिमालय की गोद में आया हूँ.बचपन में परिवार सहित वैष्णो देवी और उत्तराखंड की यात्रा की थी.कुछ-कुछ यादें अब भी ज़हन में है.देहरादून से मसूरी जाते वक़्त रास्ते में एक नदी लगती है.शायद गंगा ही थी.तब आई, बाबा और आजी, तीनों नहाने चले गए.मुझे और मेरी बहन को बस में ही छोड़ गए थे.मुझे भी नहाना था.नदी के पानी में खेलना था, मस्ती करनी थी.लेकिन मैं ठहरा छोटा.लेकिन नदी में उतरने की धुन सवार थी.सो, बस का दरवाज़ा खोलने की कोशिश करने लगा.शरीर में जितनी भी ताक़त थी, लगा कर दरवाज़े को धक्का लगाया.एक ही धक्के में दरवाज़ा खुला और मैं बस के बाहर नीचे सड़क पर सर के बल गिर पड़ा.कुछ गुलांटियां खाते हुए नदी की मुंडेर से जा टकराया.मेरी बहन ज़ोर से चिल्लाई और आई,बाबा एवं आजी भागते हुए आये.शुक्र है उस मुंडेर का जो मुझे बचा लिया.फिर मैंने नदी में जाने का विचार छोड़ दिया.ख़ैर, हिमालय ने मुझे सबक़ सीखा दिया था.

मैं जहाँ भी रहा हूँ, पहाड़ मेरे आसपास ही रहे है.इंदौर, मेरा जन्मस्थान, वो भी विंध्याचल की पहाड़ियों से घिरा हुआ है.मणिपाल और पुणे, सह्याद्रि श्रृंखला से घिरा हुआ है.

मुझे पहाड़ों से प्यार है.और शायद, पहाड़ों को भी मुझसे.
इसलिए मुझे हमेशा अपनी गोद में बसाये रखते है.


श्री गुरुदेव दत्त....

Thursday, September 15, 2016

इंजीनियर्स डे..

आज सुबह से व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर इंजीनियर्स डे के बधाई सन्देश देख रहा हूँ.सर विश्वेश्वरैया की याद में यह दिन मनाया जाता है.सभी इंजीनियर्स एक दूसरे को शुभकामनाएँ दे रहे है..लेकिन, मैं शायद इन शुभकामनाओं के लिए उचित पात्र नहीं हूँ.अब आप सोचेंगे कि ऐसा क्यों? जबकि, मैंने तो "इंजीनियरिंग" की है. जी हाँ, मैंने इंजीनियरिंग तो की है, लेकिन मैं इंजीनियर नहीं हूँ.मैं केवल एक इंजीनियरिंग ग्रैजुएट हूँ.मेरा कार्यक्षेत्र भी टेक्निकल नहीं है.मैंने ग्रैजुएट होने के बाद कोई ऐसा काम नहीं किया, जिससे मैं यह कह सकूँ कि, मैं इंजीनियर हूँ.इस बात का मुझे थोड़ा अफ़सोस है और शायद हमेशा रहेगा.अब आप सोच रहे होंगे कि मैं यह बात आज क्यों कर रहा हूँ? असल में होता यह है कि, इंसान अपनी कमियां हमेशा छुपाना चाहता है.इसलिए वो कोई ना कोई बहाना ढूंढता है.लेकिन, मेरी यह कमी मुझ पर बोझ लगने लगी थी.सो आज बोझ उतारने का अवसर मिल गया, इंजीनियर्स डे के बहाने.

ख़ैर सभी वास्तविक "इंजीनियर्स" को हार्दिक शुभकामनाएँ.
मैं ख़ुद के लिए किसी दिन "फ़र्ज़ी" इंजीनियर्स डे मना लूंगा.



श्री गुरुदेव दत्त....

Friday, August 19, 2016

तस्वीर..

आज अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफी दिवस है.कोई तस्वीर तो अपलोड नहीं कर पाया,इसलिए लिख रहा हूँ.

कहते है जो काम तलवार नहीं कर सकती, वो कलम कर दिखाती है.
सही कहते है.
लेकिन,जो काम तलवार और कलम नहीं कर सकती, वो तस्वीर कर दिखाती है.


अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफी दिवस की शुभकामनाएं.
श्री गुरुदेव दत्त....

Sunday, August 7, 2016

मैं घर आ गया हूँ..

सुबह के आठ बज चुके है.हलकी धूंप निकली हुई है.आकाश में बादल बिखरे पड़े है.हाथ में अदरक वाली चाय का कप है.तीन हफ़्तों बाद खुद की बनाई हुई चाय पी रहा हूँ.जी हाँ! मैं पुणे आ गया हूँ.मैं घर आ गया हूँ.ऐसा लग रहा है मानो तीन हफ्ते नहीं, महीने गुज़र चुके है.सुकून है अब.


शुभ प्रभात..
श्री गुरुदेव दत्त....

Monday, August 1, 2016

यात्रा वृत्तान्त - मधुबनी से सहरसा, १५० किलोमीटर - ६ घंटे में..

यात्रा वृत्तान्त-
मधुबनी से सहरसा, १५० किलोमीटर - ६ घंटे में..

बचपन में स्कूल की परीक्षाओं में निबंध लिखने को आते थे.कोई त्यौहारों पर लिखता था,कोई सामाजिक विषयों पर, तो कोई यात्रा वृत्तान्त पर लिखता था.मुझे यात्रा वृत्तान्त पर निबंध लिखना बहुत पसंद था.मेरे आई-बाबा की कृपा से मैं बहुत सी यात्राएं कर चूका हूँ.गर्मी की छुट्टियों में आजी के पास ग्वालियर और जबलपुर जाया करता था.परिवार के साथ महाराष्ट्र-दर्शन और वैष्णो देवी जैसी यात्राएं भी की है.मुझे यात्रा करना बहुत पसंद है.शायद इसलिए मुझे कार्य(जॉब) भी ऐसा ही मिला, जिसमें यात्रा करने के अवसर भरपूर है.वैसे तो जीवन भी एक यात्रा ही है,जो प्रत्येक जीवंत प्राणी को करनी होती है.जन्म से मृत्यु तक की यात्रा.कलिंग-विजय के पश्चात् एक बौद्ध भिक्षु ने सम्राट अशोक से कहा था कि, " तुम्हारा भाग्य सम्राट से भी ऊँचा होगा.तुम्हारा भाग्य उस यात्री का होगा, जो अपनी यात्रा समाप्त कर लेता है".
क्या? यह वाक्य आपने कहीं सुना है? हाँ! हाँ! जनता हूँ. यह हिंदी फिल्म अशोका का डायलॉग है.आप भी ना! नक़ल झट से पकड़ लेते है.लेकिन, जो भी हो, उस भिक्षु ने उचित ही कहा था.

खैर छोड़िये इन दार्शनिक बातों को.बिंदु पर आते है.बिंदु! अरे भाई, वह गुज़रे ज़माने कि हिंदी फिल्मों कि अदाकारा बिंदु नहीं! पॉइंट भाई - पॉइंट पर आते है. आप लोग हर जगह हिंदी फिल्मों को घुसा देते है.चलिए कोई बात नहीं.गलती आपकी भी नहीं है.हिंदी फिल्में हम भारतीयों के रग-रग में बसी हुई है.

बस!अब बहुत हुई इधर-उधर कि बातें.अब काम कि बात करते है.हाँ! तो भाई, बात ऐसी है कि, मैं एक यात्रा वृत्तान्त लिख रहा हूँ, जो मैंने अभी दो दिन पहले ही की है.

तारीख ३० जुलाई,२०१६ को मुझे ऑफिशियल टूर पर बिहार में मधुबनी से सहरसा जाना था.करीब १५० किलोमीटर का रास्ता था.कुछ लोगों से पूछताछ करी कि, कैसे जाना है? मुझे ट्रेन से जाने की इच्छा थी.लेकिन, बिहार में बाढ़ के कारण मधुबनी से सहरसा तक का एकमात्र रेल मार्ग बंद हो चुका था.अब बस से जाने का ही एकमात्र विकल्प बचा था.मधुबनी से सहरसा तक सीधे बस भी नहीं थी.लोगों ने बताया था कि, मधुबनी से सकरी जाओ,वहां से सहरसा के लिए सीधे बस मिल जाएगी,वो भी ए सी बस.मैंने सुबह १०:३० बजे मधुबनी से सकरी के लिए बस पकड़ी.आधे घंटे में सकरी आ गया.बस से उतारते ही चार-पाँच कंडक्टरों ने मुझे घेर लिया.बोले, ढाई घंटे में सहरसा पहुँचा देंगे.मैंने मना कर दिया.मुँह में ही कुछ बड़बड़ाते हुए वो चले गए.मैं एसी बस का इंतज़ार करने लगा.१५-२० मिनट इंतज़ार करने के बाद बभी बस नहीं आयी तो सोचा लोकल ट्रांसपोर्ट कि बस में ही चला जाये.सो,चढ़ गया भाई बस में.कंडक्टर ने टिकट काटते हुए कहा कि, सिमराही तक छोड़ देंगे,फिर वहां से सहरसा की बस मिल जाएगी.मैंने कहा कि, आप तो सहरसा तक छोड़ने वाले थे. कंडक्टर मेरे प्रश्न को अनसुना करते हुए आगे बाढ़ गया.मैं भी चुपचाप बैठ गया.बिहार में कौन झगड़ा मोल ले, यही सोचकर.सिमराही तक सड़क फ़ॉर लेन थी.इसलिए कोई परेशानी नहीं हुई.करीब दो घंटे में सिमराही आ गया.दोपहर को करीब एक बजे सिमराही से सहरसा के लिए बस पकड़ी.वो भी लोकल ट्रांसपोर्ट.सिमराही से सहरसा तक का रास्ता सिंगल लेन का था और ग्रामीण क्षेत्र से होकर गुज़रता था.अब मेरे गले में आ चुकी थी." जय श्री राम " और " श्री गुरुदेव दत्त " बोल कर मैंने सफ़र कि शुरुआत करी.मुझे नहीं पता था कि, इस सफ़र में मैं कितना (Suffer) करने वाला था.बस धीरे-धीरे २५-३० की गति से चल रही थी.रास्ते में खेत-खलिहान दिख रहे थे.चारों ओर हरियाली थी.तभी अचानक बस का ब्रेक लगा.खिड़की से बहार झांक कर देखा तो पता लगा कि, कुछ भैसें बड़ी शान से नखरा दिखाते हुए सड़क पार कर रही थी.क्यों ना करे भाई? यह ग्रामीण क्षेत्र है.और वैसे भी लालू यादव को भैसों से बड़ा लगाव है.तो फिर कोई भैसों से पंगा क्यों ले? भैसों के सड़क पार करते ही बस फिर चल पड़ी.हर पाँच-दस मिनट में सवारी बैठाने के लिए बस के ब्रेक लग जाते थे.बस कि सीट भी गज़ब थी.पिचकी हुई.फोम पिचककर पत्थर हो चुका था.पिछवाड़ा भी अब जलन करने लगा था.बावन सवारी कि क्षमता वाली बस में अस्सी यात्री भरे पड़े थे.सब एक-दूसरे में घुसे पड़े थे.सामान अलग बिखरा पड़ा था.ऊपर से बिहार कि धूल-मिटटी से भरी सड़कें.ना चाहते हुए भी इंसान आधा किलो मिटटी खा जाता है.साथ ही साथ, ग्रामीणों की मदमस्त कर देने वाली पसीने कि ख़ुशबू.वाह! क्या सफर (Suffer) है? अभी आधा रास्ता तय हुआ ही था कि बस फिर रुक गयी.इस बार बस का टायर पंक्चर हो गया था.मतलब सोने पे सुहाग.खैर, इसी बहाने पिछवाड़े को थोड़ा आराम तो मिला.१५-२० मिनट पंक्चर ठीक होने में लग गए.ठीक होते ही बस फिर चल पड़ी.धीरे-धीरे रेंगते हुए आखिर दोपहर के ४:३० बजे सहरसा बस स्टैंड पहुँच ही गई.

इस सफ़र में मुझे इतना तो समझ में आ ही गया कि, कभी-कभी हमें ख़ुद को किस्मत के भरोसे छोड़ देना होता है.यह किस्मत का ही करम था, जिसने मुझे बिहार के ग्रामीण क्षेत्र के नज़ारे देखने का मौका दिया.

साथ ही साथ इस "कुशल" को सकुशल सहरसा पहुँचा दिया.देर आए, दुरुस्त आए.


श्री गुरुदेव दत्त....

Monday, June 27, 2016

ऐ कविता! आज तुझे लिखूंगा.

एक अरसा गुज़र गया, तुझे लिखा नहीं,
आज लिखूंगा.
नीली स्याही के रंग से, तेरे शब्दों में रंग भरूंगा.

कुछ वाक्य, जो अधूरे से है, उन्हें अर्ध-विराम दूंगा,
कुछ वाक्य, जो पूरे है, उन्हें पूर्ण-विराम दूंगा.

ख़फ़ा ना होना मुझसे यूँ तू,
ये तो शब्द है, जो मेरा साथ नहीं दे रहे.

वर्ना, मैं तो उत्सुक हूँ तुझे लिखने के लिए,
ऐसा मेरे स्वप्न कह रहे है है.

अब आषाढ़ का मौसम जो आया है,
शब्दों का साथ भी मैंने पाया है.

देख उस काले बदल को, जो बरसने आया है,
लिखना है आज तुझे,बारिश की बूँदों का पैग़ाम आया है.

मिटटी की सुगंध भी अब आने लगी है,
चारों ओर हरियाली छाने लगी है.

मेरा मन भी अब क़ाबू में नहीं,
क्योंकि, शब्दों की ख़ुमारी छाने लगी है.

अब और रुका नहीं जाता,अब और सहा नहीं जाता,
तुझे लिखे बिना अब एक पल भी रहा नहीं जाता.

क्यूंकि, एक अरसा गुज़र गया, तुझे लिखा नहीं,
ऐ कविता! आज तुझे लिखूंगा.
नीली स्याही के रंग से,तेरे शब्दों में रंग भरूंगा.



श्री गुरुदेव दत्त....

Sunday, May 22, 2016

धर्म ..

संसार में कोई भी वस्तु नग्न नहीं होती.प्रत्येक वस्तु पर एक आवरण चढ़ा होता है.आवरण के बिना वस्तु का अस्तित्व नहीं हो सकता.आत्मा और धर्म का सम्बन्ध भी मुझे कुछ ऐसा ही लगता है.जहाँ, आत्मा वस्तु है और धर्म आवरण.देह का आवरण अर्थात वस्त्र जब मलिन हो जाता है, तब उसे रसायनों से स्वच्छ पड़ता है.ठीक उसी तरह, आत्मा का आवरण अर्थात धर्म जब मलिन हो जाता है, तब उसे भी स्वच्छ करना पड़ता है.धर्म रूपी वस्त्र को कर्म-रूपी रसायन से स्वच्छ करना पड़ता है.ये हमारे कर्म ही है, जो धर्म को अधर्म में और अधर्म को धर्म में परिवर्तित करते है.


श्री गुरुदेव दत्त....

Friday, April 22, 2016

विडम्बना : भाग-२..

विडम्बना : भाग-२..

जिन हाथों में वह अपने सुहाग के नाम की चूड़ियां पहनती थी, उन्ही हाथों से उसने अपने पति की चिता को अग्नि दी.चिता की लाल अग्नि में उसकी चूड़ियों का रंग भी समा गया.अपने बच्चों को छाती से चिपकाए चिता के ठन्डे होने तक वह वहीँ बैठी रही.पति की चिता तो ठंडी हो गयी, लेकिन उसका(पत्नी) ह्रदय जल उठा.जलते ह्रदय और बुझते सपनों को लेकर बच्चों के साथ वो घर निकल पड़ी.घर की चौखट पर पैर रखते ही उसे यादों ने जकड़ लिया.वह चौखट पर ही गिर पड़ी.लेकिन अब उसे सहारा देने वाला कोई नहीं था.

रात उसकी चौखट पर ही बीती.सुबह बच्चों के रोने की आवाज़ से उसकी नींद खुली.कुछ सचेत अवस्था में आने पर उसे समझ आया कि अब उसे ही बच्चों को पालना है.वह कुछ सोच में पड़ गयी.उसने शहर जाकर कुछ काम करने का तय किया.लेकिन उसके पास शहर जाने के क्या, खाना खाने तक के पैसे नहीं थे.खेत और पालतू जानवर तो पहले ही बिक चुके थे.सो, वह साहुकार के पास अपना घर गिरवी रख और कुछ पैसे लेकर अपने साल के लड़के और साल की लड़की को लेकर शहर निकल पड़ी.

जैसे ही वह शहर पहुंची, भीड़-भाड़ और गाड़ियों कि रेलमपेल देख घबरा गयी.यहाँ उसका कोई परिचित  ना था,रहने का कोई ठिकाना ना था.लोगों की चुभती नज़रों से उसे डर लगने लगा.वह हताश होकर एक मंदिर में बैठ गयी.भगवान से प्रार्थना करने लगी.तभी मंदिर के पुजारी ने उसे देखा और उससे बात की.पुजारी भला मानुष था.उसे उस पर दया आयी.पुजारी ने उसे एक घर में नौकरानी का काम दिलवा दिया.

काम मिलने पर वह थोड़ी खुश हुई.उसे रहने को कमरा मिला.पगार भी ठीक-ठाक मिलने लगा.समय कुछ अच्छा गुजरने लगा.वह अपनी बेटी को स्कूल भेजने लगी.उसके जलते हुए ह्रदय को अब कुछ ठंडक मिलने लगी थी.बुझते हुए सपनों को उम्मीदों की चिंगारी लगने लगी थी.लेकिन भाग्य को उसकी यह छोटी सी ख़ुशी मंज़ूर ना थी.उसके मालिक ने एक दिन मौका पाकर उस पर बलात्कार किया.वह चीखी, रोई, गिड़गिड़ाई.लेकिन उस क्रूर मालिक ने उसकी एक ना सुनी.वह अपनी इज़्ज़त बचा ना सकी.जैसे-तैसे वह बच्चों को लेकर वहां से भागी.

अब वह पूरी तरह से टूट चुकी थी.वह हताशा और निराशा से घिर चुकी थी.वह बस सड़क पर चलती जा रही थी.उसे कुछ समझ नहीं रहा था, कि वो कहाँ जा रही थी? अपने बच्चों को कैसे पालेगी?
चलते -चलते रात हो चुकी थी.वह थक चुकी थी.शहर की एक व्यस्त गली में एक इमारत के पास पहुंच वह ज़मीन पर ही बैठ गयी.आसपास की भीड़ देख उसे समझ आया कि वो कहाँ पहुंच गयी थी? अब उसे पैसे कमाने का तरीका मिल गया था.

उसने मन ही मन कुछ तय किया.फिर अपने सोते हुए बच्चों को एक अनाथालय में छोड़ वह उस इमारत में चली गयी.उस इमारत में वैश्यालय था.अपनी इज़्ज़त को बेच वह बच्चों की खुशियां खरीदना चाहती थी.


कितनी ही स्त्रियां गावों को छोड़ शहरों में आती है.मजबूरी में वेश्यावृत्ति, मजदूरी और ना जाने क्या-क्या करती है? खुद का पेट भरे ना भरे, अपनी परिवार का पेट भरने के लिए किसी भी हद तक चली जाती है.ऐसी स्त्रियां तो आदरणीय होती है.लेकिन समाज इन्हें तिरस्कृत करता है.इन पर अत्याचार करता है.

यह विडम्बना ही है हमारे तथा-कथित सभ्य समाज की.
श्री गुरुदेव दत्त....

Wednesday, March 23, 2016

होली..

लो फिर आ गया है रंगों का त्यौहार जिसे कहते है होली,
रात को सब मिलकर जलाएंगे बुराइयों की होली,
चेहरों पर मलो गुलाल और और मारो पिचकारी,
ख़ूब करो मस्ती और गटक लो दो-चार भांग की गोली,
निकाल फेकों नफ़रत और भर दो प्यार से सबकी झोली,
तो दोस्तों, इस होली पर खोल दो सबके लिये अपने दिल की खोली.


सभी को होली की शुभकामनाएं.
श्री गुरुदेव दत्त....

Tuesday, March 22, 2016

विडम्बना..

वह सालभर के बच्चे को ज़मीन में दफ़ना कर आया था.रातभर सो नहीं पाया.केवल रोता रहा.आँसूं जैसे उसके रात के साथी बन गए थे.चौखट पर सर टिकाये अधखुली आँखों से सुबह का सूरज देखा.आँखों के पास काले घेरे और पलकों में जमा कुछ गीला सा कीचड़ चेहरे की दुर्दशा बयाँ कर रहा था.तन के कपड़े तार-तार होकर चिथड़े हो चुके थे.पेट में भूख थी, लेकिन खाने को रूखी-सूखी भी ना थी.जैसे -तैसे पानी पीकर ज़िंदा था.अन्दर घर में बैठी पत्नी अपने गुज़रे हुए बच्चे के लिए आँसूं बहा रही थी.दूध पीते बच्चे की मौत एक माँ के लिए सबसे ज्यादा तकलीफ़देह होती है.

चौखट पर बैठे-बैठे ही सूरज सर चढ़ आया.सोचा अब आगे क्या? पत्नी और दो बच्चों का पेट भरना है.अब क्या किया जाये? यही सोचकर घर से निकल पड़ा.कई दिनों से कुछ खाया नहीं था.पेट में अन्न का एक दाना नहीं था.ज्यादा दूर नहीं चल पाया.एक पेड़ की छाँव में पहुंच ज़मीन पर गिर पड़ा.

शाम ढलने को थी.घर पर पत्नी राह देख रही थी.तभी किसी ने आकर उसके पति की मृत्यु की खबर दी.बच्चों को लेकर वो बदहवास सी दौड़ने लगी.राह में कई बार ठोकर खाकर गिरती और उठ कर दौड़ती.उस पेड़ के पास पहुंची, जहाँ उसका पति ज़मीन पर गिरा था.आँखें ऊपर की ओर उठा देखा तो पति फाँसी पर लटका हुआ था.पत्नी रोई, चीखी, चिल्लाई.कभी हाथों की चूड़ियाँ तोड़ती, तो कभी बच्चों को छाती से चिपका लेती.उसका पति ज़िन्दगी से हार चुका था.

यह कोई कहानी नहीं, कोई किस्सा भी नहीं.यह हक़ीक़त है.
यह एक किसान और उसके परिवार की व्यथा है.
"गरीब किसान", जो भारत में रहता है.

ऐसे ना जाने कितने ही किसान है जो रोज़ ज़िंदगी से हार रहे है.उनके परिवार गरीबी और भुखमरी से जूझ रहे है.और ऐसा तब तक चलता रहेगा, जब तक भारत की "सरकार" और "जनता" उस गरीब किसान के लिए नहीं सोचेगी, ना ही कुछ करेगी.

किसान को भारत में "अन्नदाता" का दर्ज़ा दिया जाता है.उसे माँ अन्नपूर्णा का वरदान प्राप्त है की वो संसार का पेट भरेगा.लेकिन यही किसान जो सबका पेट भरता है, उसे ख़ुद के और उसके परिवार के लिए दो वक़्त का अन्न नसीब नहीं हो पाता.

यह विडम्बना ही है इस देश की.
आखिर उस किसान का दोष है ही क्या?
क्या यह कोई बता सकेगा?




श्री गुरुदेव दत्त....

Thursday, March 17, 2016

"शेठ की गाड़ी ड्राइवर का पसीना, सड़क पर चले बनके हसीना".

"शेठ की गाड़ी ड्राइवर का पसीना, सड़क पर चले बनके हसीना".



यह पंक्ति आज एक ट्रक के पीछे लिखी हुई देखी.आपने भी कई बार हाइवेज पर गाड़ियों के पीछे कुछ न कुछ लिखा हुआ देखा होगा.ये पंक्तियाँ हमें बरबस ही आकर्षित करती है.हाइवेज की भी एक अनोखी दुनिया है, जो हमें बहुत कुछ सिखा जाती है.कभी रफ़्तार के रूप में,तो कभी इन पंक्तियों के रूप में.आप इन पंक्तियों को ध्यान से पढ़ेंगे तो इनके पीछे की भावनाएं समझ आएँगी.इनको लिखने के पीछे किसी का शायराना अंदाज़ होता है तो किसी का आशिक़ मिज़ाज़.कोई अपना अनुभव बांटता है तो कोई कुछ सीख देता है.

कुल मिला कर हाइवेज पर दौड़ती गाड़ियों और उनके चालकों से बहुत कुछ सीख सकते है.



श्री गुरुदेव दत्त....

Tuesday, March 8, 2016

नारी..

नारी केवल एक "देह" नहीं है.वो केवल "आत्मा" भी नहीं है.नारी एक "शक्ति" है, "ऊर्जा" है.हर मनुष्य को जीने के लिए "शक्ति" की आवश्यकता होती है.मनुष्य क्या? "शिव शंकर" को भी जीने के लिए "शक्ति" की आवश्यकता थी.फिर मनुष्य की क्या बात है? नारी वही "शक्ति" है.ज़रूरी नहीं कि जीने के लिए नारी का केवल "पत्नी-स्वरुप" ही हो.वो किसी भी रूप में हो सकती है.एक माँ, एक बहिन या बहू.

इसी "नारी" स्वरुप शक्ति को "प्राप्त" करने के लिए सदियों से कई पुरुषों ने अनगिनत युद्ध भी किये.उनका हश्र क्या हुआ, ये इतिहास में दर्ज़ है.पुरुष सदा से नारी-शक्ति "ग्रहण" करने कि अभिलाषा मन में लिया फिरता रहा है.लेकिन कभी उसने "नारी" से "शक्ति" ग्रहण करने का प्रयास नहीं किया.नारी से शक्ति ग्रहण करने के लिए प्रथम पुरुषों को नारी को समझना पड़ेगा.नारी कोई रहस्य या पहेली नहीं है.उसे समझने के लिए "नर" को "नारायण" बनने का प्रयास करना पड़ेगा.और यह तब संभव होगा, जब "पुरुष" अपने "पुरुषार्थ" का "सदुपयोग" करना सीखेगा.

सनातन-हिन्दू धर्म में ही नहीं, संसार के सभी धर्मों में नारी को पूजा गया है.परन्तु एक ओर तो हम उसकी "पूजा" करते है और दूसरी ओर "दूजा" समझ उसका अपमान भी करते है, उस पर अत्याचार करते है.

श्रीकृष्ण ने उनका संपूर्ण जीवन "नारी" को उसके अधिकार दिलवाने की लड़ाई लड़ने में समर्पित कर दिया.श्रीकृष्ण से अच्छा कोई "नारी" को समझ नहीं पाया.हम श्रीकृष्ण तो नहीं बन सकते.परन्तु हाँ ! उनके बताये हुए उपदेशों को व्यव्हार में लाने का प्रयास तो कर ही सकते है.

नारी को "अबला" से "सबला" बनाने में "नर" और "नारी", दोनों को ही उचित और आवश्यक कर्म करना होगा.



श्री गुरुदेव दत्त....

Friday, March 4, 2016

आज़ादी !

आज़ादी !

देश में हर तरफ आज़ादी की गूंज है.आज़ादी किसे पसंद नहीं.हर किसी को आज़ादी चाहिए.
मज़दूर को ठेकेदार से ,किसान को जमींदार से, गरीब वर्ग को गरीबी से, मध्यम वर्ग को साहूकार से, अमीर को नौकरी से.कुछ लोगों को समाज और धर्म से आज़ादी चाहिए.

इतना ही नहीं,कइयों को तो देश से ही आज़ादी चाहिए.ठीक है.मान लो मिल गयी आपको आज़ादी.अब क्या करोगे इस आज़ादी का?अपना पेट आज़ादी से भरोगे क्या?पेट भरने के लिए खाना चाहिए.और खाने के लिए पैसा.कहाँ से लाओगे पैसा? आज़ादी बेचकर? किसे बेचोगे? किसी और देश को?आज़ादी बेचने के लिए ही संघर्ष किया था क्या?

आप इस देश की प्रजा है.आपका कर्त्तव्य है देश की अखंडता और एकता की रक्षा करना.अगर आप इस कर्तव्यपरायणता को बंधन कहते है और इससे आज़ादी पाना चाहते है,तो निश्चित ही आप देश विरोधी है.

एक ऊँची डिग्री हासिल कर लेने या पचास किताबें पढ़ लेने से अगर आप ये समझते है कि आपको आज़ादी का अर्थ समझ आ गया है,तो आप गलत है.आज़ादी मांगने से पहले आज़ादी का अर्थ समझ लेना ज़रूरी है.



श्री गुरुदेव दत्त....

Thursday, March 3, 2016


सूखा पत्ता भी दुनिया को रंगीन बना जाता है.
हम तो फिर इंसान है..

श्री गुरुदेव दत्त....

Monday, February 29, 2016

वो बचपन था..


बचपन था वो..

थोड़ा चंचल,थोड़ा गंभीर.
अपनी ही धुन में रहने वाला,
मस्तमौला फ़क़ीर सा.

बारिश के मौसम में,
सड़क पर बहते पानी में,
छप-छप करते खुद भीग जाता,
लेकिन अपनी कागज़ की कश्ती को ज़रूर बचाता.

एक पल सपना देखता आसमाँ में जहाज उड़ाने का,
दूजे पल दौड़ते हुए किसी पहिये को डंडी से रफ़्तार दे देता.

रंग-रूप का उसे कोई लिहाज़ ना था,
रुपये-पैसे का कोई कामकाज ना था.

ना दुनिया को कोई फ़िकर,
ना रिवाज़ों का डर.
रिश्ते-नाते तो केवल नाम ही थे उसके लिए,
उसे तो बस प्रेम ही चाहिए था इस जहाँ के लिए.

क्यूंकि वो बचपन था..



श्री गुरुदेव दत्त....









Thursday, February 25, 2016

किराये की साइकिल.


किराये की साइकिल -

गर्मी की छुट्टियां शुरू हो चुकी थी.हर बार की तरह, राजू इस बार भी अपने काका के यहाँ गया.काका के छोटे लड़के के साथ उसकी खूब जमती थी.वो राजू से करीब ७-८ साल बड़ा था.वो जहाँ भी जाता,राजू उसके साथ हो लेता.वो भी राजू को कभी मना नहीं करता.दोनों में बड़ा ही प्रेम था.एक दिन राजू का भाई क्रिकेट खेलने गया.राजू भी पीछे-पीछे मैदान पहुंच गया.राजू की उम्र ८ बर्ष की थी.उम्र में छोटा होने के कारण वो एक कोना पकड़ कर बैठ गया और अपने भाई का खेल देखने लगा.मैदान में काफी सारे बच्चे खेल रहे थे.कोई क्रिकेट तो कोई फुटबॉल खेल रहा था.तभी राजू ने एक बच्चे को देखा जो साइकिल चलाना सीख़ रहा था.राजू के मन में भी साइकिल चलाने की इच्छा हुई.पहले वो ३ पहिये वाली साइकिल चला चूका था.खैर, देखते ही देखते शाम हो गयी और वो अपने भाई के साथ घर को निकल पड़ा.रस्ते में उसने अपने भाई से कहा: " भैया मुझे आपकी साइकिल चलानी है."
बड़ा भाई उसकी बात सुनकर हंस  पड़ा और कहा: "तू अभी छोटा है,मेरी साइकिल कैसे चलाएगा?यह बड़ी है."
राजू ने कहा:" फिर मुझे बड़ी साइकिल खरीद दो."
बड़े भाई ने कहा: " जब तू मेरी उम्र का हो जायेगा,तब तुझे साइकिल खरीद दूंगा."
अब बच्चे तो बच्चे होते है.राजू जिद करने लगा.बड़े भाई ने समझाया: "अगर साइकिल ख़राब हो गयी तो क्या करेगा?तू ठीक तो कर पायेगा नहीं.अभी साइकिल खरीदना सही नहीं है."
फिर भी राजू जिद पर अड़ा रहा.
बड़े भाई ने कहा:" अच्छा ठीक है.अभी साइकिल खरीद तो नहीं सकते.किराये पर ले सकते है.उसे तू चला लेना."
राजू खुश हो गया.और इस बात पर राज़ी हो गया.
अगले दिन राजू सुबह जल्दी उठ गया और भाई को भी उठाया.बिना नहाये ही दोनों "किराये की साइकिल" लेने निकल पड़े.
बड़े भाई ने मोल-भाव करके राजू को एक साइकिल दिलवा दी.एक दिन का किराया ३ रुपये.राजू बड़ा खुश हुआ.उसने ३ दिन तक खूब साइकिल चलाई.अब साइकिल वापिस करने का समय था.सो बड़े भाई के साथ निकल पड़ा.रास्ते में उसकी साइकिल की चेन उतर गयी.
वो बड़े भाई से बोला:" भैया साइकिल की चेन उतर गयी है.आप वापिस चढ़ा दो."
बड़े भाई ने हँसते हुए कहा:" साइकिल तेरी है,चेन भी तू ही चढ़ा."
राजू : "लेकिन भैया मुझे साइकिल की चेन चढ़ाते नहीं आती."
बड़े भाई ने कहा: " मैंने पहले ही तुझे समझाया था,लेकिन तू नहीं मना.अब साइकिल को हाथ में पकड़ कर चल."
राजू गुस्सा हो गया.और साइकिल हाथ में ले घसीटने लगा.कुछ ही देर में साइकिल की दुकान आ गयी.दुकानदार ने राजू से कहा:" क्यों बेटा, चला ली साइकिल?"
राजू : "हाँ."
दुकानदार: "तो फिर साइकिल घसीट कर क्यों ल रहे हो?"
राजू गुस्से में: "चेन उतर गयी."
दुकानदार:" तो चढ़ा लेते."
राजू: "नहीं आती."
दुकानदार मुस्कुराते हुए : " तो फिर इधर आओ,हम चढ़ा देते है."
दुकानदार ने एक झटके में चेन चढ़ा दी.
राजू: " भैया मुझे भी चेन चढ़ाना सीखा दो न."
दुकानदार: "पहले आप वादा करो कि, कभी ज़िद नहीं करोगे.और अपने से बड़ों कि बात मानोगे."
राजू: " हाँ, ठीक है."
दुकानदार ने राजू को चेन चढ़ाना सीखा दिया और कहा:" बेटा, किसी भी चीज़ इस्तेमाल करते हो, तो उसे सम्भालना और उसका ध्यान रखते आना चाहिए."
राजू: "जी भैया,मैं समझ गया."
तभी राजू के बड़े भाई ने राजू से कहा: " अब घर चलें?आज खाने में आम का रस और पूरी बना है."
राजू ख़ुशी से : " आमरस और पूरी!, जल्दी चलो."
दोनों भाई घर की ओर चल पड़े.राजू रास्तेभर "किराये की साइकिल" के बारे में सोचता रहा.

यहाँ सब बिकता है..

यहाँ क्या नहीं बिकता?
यहाँ सब बिकता है.जी हाँ!

जाति के नाम पर आरक्षण बिकता है,
वोट के नाम पर समाज बिकता है,
धर्म के नाम पर पाखंड बिकता है,
शिक्षा के नाम पर विद्या बिकती है,
कला के नाम पर कलाकार बिकता है,
मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता बिकती है,
सेक्स के नाम पर देह बिकती है,
शादी के नाम पर लड़का/लड़की बिकते है,
टीआरपी के नाम पर समाचार बिकता है,
विकास के नाम पर भूमि बिकती है,
राजनीति के नाम पर जनता बिकती है,
ज़िन्दगी के नाम पर खून बिकता है,
इंसानियत के नाम पर इंसान बिकता है,

देश ना हुआ, बनिये की दुकान हो गयी,क्यूंकि यहाँ सब कुछ बिकता है.



श्री गुरुदेव दत्त....


Wednesday, February 24, 2016

आँसूं..

सूर्यास्त होने को कुछ समय था,
भीड़-भाड़ वाला नर्मदा तट था,
कश्तियाँ किनारे पर आने लगी थी,
लोगों की टोलियां घर जाने लगी थी,
तट पर एक छोटा सा मंदिर था,
मंदिर के पास ही मैं तन्हा बैठा था,
शांत, शीतल जल को देख रहा था,
अपनी उदासी का जल में बने अक्स को देख रहा था,
देखते-देखते यादों में खो गया,
सुख-दुःख का हर पल याद आ गया,
हर किसी के सवालों के जवाब दिए,
सुख-दुःख में उनके आंसुओं को सहारे दिए,
मेरे भी कुछ सवाल है,
जिनका लेना मुझे जवाब है,
लेकिन यहाँ कोई ऐसा नहीं,
जो मेरे सवालों का जवाब दे सके,
अपने कंधे पर मेरे आंसुओं को बहा सके,
इसलिए,हे नर्मदे, मैं आया हूँ तेरी शरण में,
बहा ले मेरे आँसुंओं को अपने जल में,
और कर दे हल्का मेरे इस मन को....



श्री गुरुदेव दत्त....


Thursday, January 21, 2016

विचार।

विचारों का मेला है,
शब्दों का रेला है,
स्याह सी काली रात में,
अनदेखे सपनों का डेरा है,
आज तो नींद भी रूठी हुई है,
जाने आँखों से क्या खता हुई है,
कुछ देर में भोर हो जायेगी,
चिड़ियायें भी तब चहचहाएँगी,
मेरे विचारों, अब तो मैं आराम करूँ,
उन अनदेखे सपनों को अब सलाम दूँ।।

Tuesday, January 12, 2016

H-35, कृषिनगर कॉलोनी, जबलपुर

कल रात मेरे सपनों के संसार के दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी.दरवाज़ा खोल कर देखा तो एक छोटा १०-१२ वर्ष का बच्चा दिखा.मैंने पूछा, तुम कौन हो?कोई उत्तर नहीं मिला.वो मुड़कर बाहर की ओर चल दिया.उत्सुकतावश मैं भी उसके पीछे चल दिया.कुछ देर बाद वो बच्चा एक घर के सामने जाकर रुक गया.फिर मैंने उससे पूछा: तुम मुझे ये कहाँ ले आये हो?परन्तु वो फिर बिना कोई उत्तर दिये एक तरफ भाग गया.उसे ढूंढने की कोशिश की, पर वो नहीं दिखा.अब मैंने उस घर की तरफ देखा, जहाँ वो रुक गया था.वो घर किसी सरकारी कॉलोनी का लग रहा था.एक छोटा सा मुख्य दरवाज़ा था, जो लकड़ी का था.थोड़ा टुटा-फूटा, लेकिन काम-चलाऊ.दरवाज़े पर एक बड़ा सा नीम का पेड़ था.दरवाज़े से अंदर घुसते ही गाय के गोबर से लीपा हुआ एक बड़ा सा आँगन.घर कुछ जाना-पहचाना सा लगा.अरे! ये तो वही घर है, जहाँ मेरा बचपन गुज़रा है.हाँ! इस घर में मेरे बड़े काका रहते थे.ये घर है H-35, जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय की रिहायशी कॉलोनी का.मेरे काका कृषि विश्वविद्यालय में कार्यरत थे.छुट्टियों में मैं यहाँ आया करता था.इसी आँगन में मैं अपने भाई-बहनों के साथ खेला करता था.मेरी आजी(दादी) के साथ गोबर से आँगन लीपा करता था.इसी आँगन में लगे जामफल के पेड़ के जामों को तोड़ कर खाया करता था.आजी को बागबानी का बहुत शौक था.आँगन में ही कई तरह की सब्जियां और फूलों के पौधे लगे थे.घर के पीछे की तरफ जामुन का एक पेड़ था.उसी के जामुन खाकर जीभ जामुनी हो जाती थी.त्योहारों के समय जब सारे रिश्तेदार आया करते थे,तब इसी घर के आँगन में बैठ गप्पे लड़ाया करते थे.कुछ ही पलों में, इस घर में बीता हर एक पल आँखों के सामने आ गया.वहाँ से वापिस जाने का मन ही नहीं हुआ.लेकिन वापस तो जाना था.तो निकल पड़ा मैं अपने सपनों के संसार से बाहर.वापिस लौटते हुए मुझे वही बच्चा फिर दिखा.शायद वो मेरा "बचपन" ही था.


किसी भी इंसान वो घर सबसे प्यारा होता है जहाँ उसने अपना बचपन गुज़ारा होता है.आज भी मन करता है उस घर में रहने का,उस आँगन में खेलने का.लेकिन अब यह संभव नहीं.फिर भी अगर मौका मिले तो पल भर के लिये उस घर को देखना बस भर चाहता हूँ.शायद ये मेरा "बचपना" ही है.




श्री गुरुदेव दत्त....