Wednesday, March 23, 2016

होली..

लो फिर आ गया है रंगों का त्यौहार जिसे कहते है होली,
रात को सब मिलकर जलाएंगे बुराइयों की होली,
चेहरों पर मलो गुलाल और और मारो पिचकारी,
ख़ूब करो मस्ती और गटक लो दो-चार भांग की गोली,
निकाल फेकों नफ़रत और भर दो प्यार से सबकी झोली,
तो दोस्तों, इस होली पर खोल दो सबके लिये अपने दिल की खोली.


सभी को होली की शुभकामनाएं.
श्री गुरुदेव दत्त....

Tuesday, March 22, 2016

विडम्बना..

वह सालभर के बच्चे को ज़मीन में दफ़ना कर आया था.रातभर सो नहीं पाया.केवल रोता रहा.आँसूं जैसे उसके रात के साथी बन गए थे.चौखट पर सर टिकाये अधखुली आँखों से सुबह का सूरज देखा.आँखों के पास काले घेरे और पलकों में जमा कुछ गीला सा कीचड़ चेहरे की दुर्दशा बयाँ कर रहा था.तन के कपड़े तार-तार होकर चिथड़े हो चुके थे.पेट में भूख थी, लेकिन खाने को रूखी-सूखी भी ना थी.जैसे -तैसे पानी पीकर ज़िंदा था.अन्दर घर में बैठी पत्नी अपने गुज़रे हुए बच्चे के लिए आँसूं बहा रही थी.दूध पीते बच्चे की मौत एक माँ के लिए सबसे ज्यादा तकलीफ़देह होती है.

चौखट पर बैठे-बैठे ही सूरज सर चढ़ आया.सोचा अब आगे क्या? पत्नी और दो बच्चों का पेट भरना है.अब क्या किया जाये? यही सोचकर घर से निकल पड़ा.कई दिनों से कुछ खाया नहीं था.पेट में अन्न का एक दाना नहीं था.ज्यादा दूर नहीं चल पाया.एक पेड़ की छाँव में पहुंच ज़मीन पर गिर पड़ा.

शाम ढलने को थी.घर पर पत्नी राह देख रही थी.तभी किसी ने आकर उसके पति की मृत्यु की खबर दी.बच्चों को लेकर वो बदहवास सी दौड़ने लगी.राह में कई बार ठोकर खाकर गिरती और उठ कर दौड़ती.उस पेड़ के पास पहुंची, जहाँ उसका पति ज़मीन पर गिरा था.आँखें ऊपर की ओर उठा देखा तो पति फाँसी पर लटका हुआ था.पत्नी रोई, चीखी, चिल्लाई.कभी हाथों की चूड़ियाँ तोड़ती, तो कभी बच्चों को छाती से चिपका लेती.उसका पति ज़िन्दगी से हार चुका था.

यह कोई कहानी नहीं, कोई किस्सा भी नहीं.यह हक़ीक़त है.
यह एक किसान और उसके परिवार की व्यथा है.
"गरीब किसान", जो भारत में रहता है.

ऐसे ना जाने कितने ही किसान है जो रोज़ ज़िंदगी से हार रहे है.उनके परिवार गरीबी और भुखमरी से जूझ रहे है.और ऐसा तब तक चलता रहेगा, जब तक भारत की "सरकार" और "जनता" उस गरीब किसान के लिए नहीं सोचेगी, ना ही कुछ करेगी.

किसान को भारत में "अन्नदाता" का दर्ज़ा दिया जाता है.उसे माँ अन्नपूर्णा का वरदान प्राप्त है की वो संसार का पेट भरेगा.लेकिन यही किसान जो सबका पेट भरता है, उसे ख़ुद के और उसके परिवार के लिए दो वक़्त का अन्न नसीब नहीं हो पाता.

यह विडम्बना ही है इस देश की.
आखिर उस किसान का दोष है ही क्या?
क्या यह कोई बता सकेगा?




श्री गुरुदेव दत्त....

Thursday, March 17, 2016

"शेठ की गाड़ी ड्राइवर का पसीना, सड़क पर चले बनके हसीना".

"शेठ की गाड़ी ड्राइवर का पसीना, सड़क पर चले बनके हसीना".



यह पंक्ति आज एक ट्रक के पीछे लिखी हुई देखी.आपने भी कई बार हाइवेज पर गाड़ियों के पीछे कुछ न कुछ लिखा हुआ देखा होगा.ये पंक्तियाँ हमें बरबस ही आकर्षित करती है.हाइवेज की भी एक अनोखी दुनिया है, जो हमें बहुत कुछ सिखा जाती है.कभी रफ़्तार के रूप में,तो कभी इन पंक्तियों के रूप में.आप इन पंक्तियों को ध्यान से पढ़ेंगे तो इनके पीछे की भावनाएं समझ आएँगी.इनको लिखने के पीछे किसी का शायराना अंदाज़ होता है तो किसी का आशिक़ मिज़ाज़.कोई अपना अनुभव बांटता है तो कोई कुछ सीख देता है.

कुल मिला कर हाइवेज पर दौड़ती गाड़ियों और उनके चालकों से बहुत कुछ सीख सकते है.



श्री गुरुदेव दत्त....

Tuesday, March 8, 2016

नारी..

नारी केवल एक "देह" नहीं है.वो केवल "आत्मा" भी नहीं है.नारी एक "शक्ति" है, "ऊर्जा" है.हर मनुष्य को जीने के लिए "शक्ति" की आवश्यकता होती है.मनुष्य क्या? "शिव शंकर" को भी जीने के लिए "शक्ति" की आवश्यकता थी.फिर मनुष्य की क्या बात है? नारी वही "शक्ति" है.ज़रूरी नहीं कि जीने के लिए नारी का केवल "पत्नी-स्वरुप" ही हो.वो किसी भी रूप में हो सकती है.एक माँ, एक बहिन या बहू.

इसी "नारी" स्वरुप शक्ति को "प्राप्त" करने के लिए सदियों से कई पुरुषों ने अनगिनत युद्ध भी किये.उनका हश्र क्या हुआ, ये इतिहास में दर्ज़ है.पुरुष सदा से नारी-शक्ति "ग्रहण" करने कि अभिलाषा मन में लिया फिरता रहा है.लेकिन कभी उसने "नारी" से "शक्ति" ग्रहण करने का प्रयास नहीं किया.नारी से शक्ति ग्रहण करने के लिए प्रथम पुरुषों को नारी को समझना पड़ेगा.नारी कोई रहस्य या पहेली नहीं है.उसे समझने के लिए "नर" को "नारायण" बनने का प्रयास करना पड़ेगा.और यह तब संभव होगा, जब "पुरुष" अपने "पुरुषार्थ" का "सदुपयोग" करना सीखेगा.

सनातन-हिन्दू धर्म में ही नहीं, संसार के सभी धर्मों में नारी को पूजा गया है.परन्तु एक ओर तो हम उसकी "पूजा" करते है और दूसरी ओर "दूजा" समझ उसका अपमान भी करते है, उस पर अत्याचार करते है.

श्रीकृष्ण ने उनका संपूर्ण जीवन "नारी" को उसके अधिकार दिलवाने की लड़ाई लड़ने में समर्पित कर दिया.श्रीकृष्ण से अच्छा कोई "नारी" को समझ नहीं पाया.हम श्रीकृष्ण तो नहीं बन सकते.परन्तु हाँ ! उनके बताये हुए उपदेशों को व्यव्हार में लाने का प्रयास तो कर ही सकते है.

नारी को "अबला" से "सबला" बनाने में "नर" और "नारी", दोनों को ही उचित और आवश्यक कर्म करना होगा.



श्री गुरुदेव दत्त....

Friday, March 4, 2016

आज़ादी !

आज़ादी !

देश में हर तरफ आज़ादी की गूंज है.आज़ादी किसे पसंद नहीं.हर किसी को आज़ादी चाहिए.
मज़दूर को ठेकेदार से ,किसान को जमींदार से, गरीब वर्ग को गरीबी से, मध्यम वर्ग को साहूकार से, अमीर को नौकरी से.कुछ लोगों को समाज और धर्म से आज़ादी चाहिए.

इतना ही नहीं,कइयों को तो देश से ही आज़ादी चाहिए.ठीक है.मान लो मिल गयी आपको आज़ादी.अब क्या करोगे इस आज़ादी का?अपना पेट आज़ादी से भरोगे क्या?पेट भरने के लिए खाना चाहिए.और खाने के लिए पैसा.कहाँ से लाओगे पैसा? आज़ादी बेचकर? किसे बेचोगे? किसी और देश को?आज़ादी बेचने के लिए ही संघर्ष किया था क्या?

आप इस देश की प्रजा है.आपका कर्त्तव्य है देश की अखंडता और एकता की रक्षा करना.अगर आप इस कर्तव्यपरायणता को बंधन कहते है और इससे आज़ादी पाना चाहते है,तो निश्चित ही आप देश विरोधी है.

एक ऊँची डिग्री हासिल कर लेने या पचास किताबें पढ़ लेने से अगर आप ये समझते है कि आपको आज़ादी का अर्थ समझ आ गया है,तो आप गलत है.आज़ादी मांगने से पहले आज़ादी का अर्थ समझ लेना ज़रूरी है.



श्री गुरुदेव दत्त....

Thursday, March 3, 2016


सूखा पत्ता भी दुनिया को रंगीन बना जाता है.
हम तो फिर इंसान है..

श्री गुरुदेव दत्त....