वह सालभर के बच्चे को ज़मीन में दफ़ना कर आया था.रातभर सो नहीं पाया.केवल रोता रहा.आँसूं जैसे उसके रात के साथी बन गए थे.चौखट पर सर टिकाये अधखुली आँखों से सुबह का सूरज देखा.आँखों के पास काले घेरे और पलकों में जमा कुछ गीला सा कीचड़ चेहरे की दुर्दशा बयाँ कर रहा था.तन के कपड़े तार-तार होकर चिथड़े हो चुके थे.पेट में भूख थी, लेकिन खाने को रूखी-सूखी भी ना थी.जैसे -तैसे पानी पीकर ज़िंदा था.अन्दर घर में बैठी पत्नी अपने गुज़रे हुए बच्चे के लिए आँसूं बहा रही थी.दूध पीते बच्चे की मौत एक माँ के लिए सबसे ज्यादा तकलीफ़देह होती है.
चौखट पर बैठे-बैठे ही सूरज सर चढ़ आया.सोचा अब आगे क्या? पत्नी और दो बच्चों का पेट भरना है.अब क्या किया जाये? यही सोचकर घर से निकल पड़ा.कई दिनों से कुछ खाया नहीं था.पेट में अन्न का एक दाना नहीं था.ज्यादा दूर नहीं चल पाया.एक पेड़ की छाँव में पहुंच ज़मीन पर गिर पड़ा.
शाम ढलने को थी.घर पर पत्नी राह देख रही थी.तभी किसी ने आकर उसके पति की मृत्यु की खबर दी.बच्चों को लेकर वो बदहवास सी दौड़ने लगी.राह में कई बार ठोकर खाकर गिरती और उठ कर दौड़ती.उस पेड़ के पास पहुंची, जहाँ उसका पति ज़मीन पर गिरा था.आँखें ऊपर की ओर उठा देखा तो पति फाँसी पर लटका हुआ था.पत्नी रोई, चीखी, चिल्लाई.कभी हाथों की चूड़ियाँ तोड़ती, तो कभी बच्चों को छाती से चिपका लेती.उसका पति ज़िन्दगी से हार चुका था.
यह कोई कहानी नहीं, कोई किस्सा भी नहीं.यह हक़ीक़त है.
यह एक किसान और उसके परिवार की व्यथा है.
"गरीब किसान", जो भारत में रहता है.
ऐसे ना जाने कितने ही किसान है जो रोज़ ज़िंदगी से हार रहे है.उनके परिवार गरीबी और भुखमरी से जूझ रहे है.और ऐसा तब तक चलता रहेगा, जब तक भारत की "सरकार" और "जनता" उस गरीब किसान के लिए नहीं सोचेगी, ना ही कुछ करेगी.
किसान को भारत में "अन्नदाता" का दर्ज़ा दिया जाता है.उसे माँ अन्नपूर्णा का वरदान प्राप्त है की वो संसार का पेट भरेगा.लेकिन यही किसान जो सबका पेट भरता है, उसे ख़ुद के और उसके परिवार के लिए दो वक़्त का अन्न नसीब नहीं हो पाता.
यह विडम्बना ही है इस देश की.
आखिर उस किसान का दोष है ही क्या?
क्या यह कोई बता सकेगा?
श्री गुरुदेव दत्त....