Monday, June 27, 2016

ऐ कविता! आज तुझे लिखूंगा.

एक अरसा गुज़र गया, तुझे लिखा नहीं,
आज लिखूंगा.
नीली स्याही के रंग से, तेरे शब्दों में रंग भरूंगा.

कुछ वाक्य, जो अधूरे से है, उन्हें अर्ध-विराम दूंगा,
कुछ वाक्य, जो पूरे है, उन्हें पूर्ण-विराम दूंगा.

ख़फ़ा ना होना मुझसे यूँ तू,
ये तो शब्द है, जो मेरा साथ नहीं दे रहे.

वर्ना, मैं तो उत्सुक हूँ तुझे लिखने के लिए,
ऐसा मेरे स्वप्न कह रहे है है.

अब आषाढ़ का मौसम जो आया है,
शब्दों का साथ भी मैंने पाया है.

देख उस काले बदल को, जो बरसने आया है,
लिखना है आज तुझे,बारिश की बूँदों का पैग़ाम आया है.

मिटटी की सुगंध भी अब आने लगी है,
चारों ओर हरियाली छाने लगी है.

मेरा मन भी अब क़ाबू में नहीं,
क्योंकि, शब्दों की ख़ुमारी छाने लगी है.

अब और रुका नहीं जाता,अब और सहा नहीं जाता,
तुझे लिखे बिना अब एक पल भी रहा नहीं जाता.

क्यूंकि, एक अरसा गुज़र गया, तुझे लिखा नहीं,
ऐ कविता! आज तुझे लिखूंगा.
नीली स्याही के रंग से,तेरे शब्दों में रंग भरूंगा.



श्री गुरुदेव दत्त....