क्या कहूँ कैसी है वो..
कभी चखूँ तो पता चले,
गुड़ की चाशनी जैसी मीठी है,
या लाल मिर्च जैसी तीखी,
इमली की तरह खट्टी है या,
समंदर के पानी जैसी नमकीन,
शक्कर की तरह चाय में घुलने वाली,
या तेल की तरह पानी पर तैरने वाली,
वो अगरबत्ती का सुगंधित धुआँ है,
या उबलते पानी की भाप है,
कभी वो सर्दियों में शिमला की बर्फ़ सी लगती है,
तो कभी गर्मियों में जैसलमेर की रेत सी लगती है,
कभी तो वो किसी चट्टान सी स्थिर दिखती है,
अगले ही पल कल-कल करती नदी सी बहने लगती है,
कभी वायु सी चंचल, चुलबुल, नटखट सी रहती है,
और कभी आसमान जैसी धीर-गम्भीर हो जाती है,
क्या बताऊँ कैसी है वो..
कभी मिलूँ, कभी चखूँ तो पता चले..