गुलाबी ठंड, उदित होता सूर्य,
मद्धम चलती हवा, पेड़ों के पत्तों की सरसराहट,
उसमें से छन कर आती सूर्यकिरणें,
ऊष्मा और कुछ लालिमा लिए,
अलसायी आँखों को जब छूती हैं,
हल्के कत्थई रंग की आँखें चमक उठती हैं,
जैसे कोई चमत्कार होता है, जैसे कोई स्वप्न साकार होता है,
ग्रीवा को छूती केश की लटें, कुछ ऐसे हिलती है,
जैसे कोई मोरनी, मोर को देख झूम उठती है,
अधरों को भी धीर कहाँ, उनके नीचे जो तिल छुपा, उसको भी चैन कहाँ,
वो भी मुस्कुराए कुछ ऐसे, जैसे कोई गुलाब कली में से खिल उठा,
क्या कहने उस सूर्यकिरण का, कि उसके मात्र स्पर्श से हो जाते हैं चमत्कार, और हो जाता है कोई स्वप्न साकार..