Thursday, February 27, 2020

सूर्यकिरण..

गुलाबी ठंडउदित होता सूर्य,
मद्धम चलती हवापेड़ों के पत्तों की सरसराहट,
उसमें से छन कर आती सूर्यकिरणें,
ऊष्मा और कुछ लालिमा लिए,
अलसायी आँखों को जब छूती हैं,
हल्के कत्थई रंग की आँखें चमक उठती हैं,
जैसे कोई चमत्कार होता हैजैसे कोई स्वप्न साकार होता है,
ग्रीवा को छूती केश की लटेंकुछ ऐसे हिलती है
जैसे कोई मोरनीमोर को देख झूम उठती है,
अधरों को भी धीर कहाँउनके नीचे जो तिल छुपाउसको भी चैन कहाँ,
वो भी मुस्कुराए कुछ ऐसेजैसे कोई गुलाब कली में से खिल उठा,
क्या कहने उस सूर्यकिरण काकि उसके मात्र स्पर्श से हो जाते हैं चमत्कारऔर हो जाता है कोई स्वप्न साकार..

Tuesday, February 4, 2020

रात के निशान....

सुबह की पहली किरण खिड़की से कमरे में झांक रही थी,
मद्धम चलती वायु से पेड़ों के पत्ते हिलोरे ले रहे थे,
रौशनी पत्तों के जाल से छनती हुई उसकी आँखों पर पड़ी,
और सरसराहट की आवाज़ से उसकी नींद खुली,
लेकिन, पलकें आँखों पर से पर्दा हटाने को तैयार ना थी,
कुछ पल यूँ हीं अलसाते हुए गुज़र गए,
आखिर नींद की बेशर्मी हटी और,
आँखों पर से पलकों का पर्दा भी हट गया,
आखों के किनारे लगा कीचड़ साफ़ करते हुए उसने अंगड़ाई ली,
देखा तो बिस्तर पर थी वह नग्न और अकेली,
सर घूम रहा था और एक असहनीय दर्द से वह कराह उठी,
कमरा अस्त-व्यस्त था और अजीब सी गंध फैली हुई थी,
वह उठी और आँखें धोने बाथरूम गयी,
आईने में खुद को देखते हुए सोचने लगी,
आखिर बीती रात हुआ क्या था, क्या किया उसने बीती रात,
तभी उसे कमर पर एक घाव दिखा,
ना जाने ये घाव कैसे हुआ, पहले तो कभी ऐसा घाव हुआ नहीं था,
यही सोचते हुए वो फिर कमरे में आयी और देखा,
कि, चादर पर भी कुछ निशान पड़े हुए थे,
कुछ-कुछ हलके लाल रंग के,
कुछ समझ नहीं आ रहा था,
आखिर बीती रात हुआ क्या था, कैसे हैं ये रात के निशान,
तभी अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई,
वह फिर सोच में पड़ गयी, कौन होगा इस वक़्त दरवाज़े पर,
क्या वही होगा, जिसकी वजह ये पड़े हैं ये रात के निशान....