Sunday, July 30, 2017

नन्हीं कोपल

एक नन्हीं सी कोपल (नवजात शिशु) फूटी है झाड़ियों (समाज) के बीच कहीं,
देखो, बचाना इसे कीटों (बलात्कारी) से,
टूट कर बिखर ना जाए ये कहीं,
भर देंगी जिंदगी तुम्हारी अनेक रंगों से,
ग़र संभाल सको इन्हें अपने दिलों में कहीं।

अवधूत चिंतन श्री गुरूदेव दत्त।

Wednesday, July 19, 2017

मासूम आंखें

मासूम आंखें -
छायाचित्र - मालिनी भट

खिड़की से झांकती ये मासूम आंखें,
कभी शरारती, तो कभी शरमाती,
कभी नम, तो कभी गुस्सैल,
बहुत कुछ संजों कर रखती है,
अपनी सपनों की दुनिया में,
हर ओर देखती है उत्सुकता से,
खोजती है है अपनापन हर जीव में,
समा लेती है, थोड़ी ख़ुशी और थोड़ा गम,
कभी थोड़ा रो कर, तो थोड़ा मुस्करा कर,
हर पल तैयार रहती है कुछ नया देखने को,
रहना चाहती है सदा हर चीज़ परखने को,
कह जाती है ज़माने से बहुत कुछ पलकें झपका कर,
सह जाती है सब कुछ बिना एक शब्द कहे,
अदम्य शक्ति है, साहस है इन आँखों में,
एक आँख और चाहिए इन्हे पहचानने को,
रहने दो इन्हें ज़िंदा; करने दो हर हसरत पूरी,
देश का भविष्य है ये; बहुत कीमती है ये मासूम आँखें..


अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त....

Thursday, July 13, 2017

कुछ अलग है ये बारिश या मैं!

सावन का आगाज़ हो चुका है,
बारिश की झड़ी शुरू हो चुकी है,
पानी की बौछारें वार कर रही है,
जो सूखी ज़मीन को सूकून दे रही है,
लेकिन इस मन का क्या करूं,
इसे अभी भी सूकून नहीं,
कुछ तो अलग है,
हांँ! कुछ अलग है ये बारिश।

इस बारिश में बचपन की वो मस्ती नहीं,
जो किसी मैदान या छत पर भीगने में थी,
गलियों में बहते पानी में काग़ज़ की कश्ती तैराने में थी,
भीगते तो अब भी है सड़कों पर,
लेकिन बाइक पर आफिस से घर जाने की जल्दी में,
तैरती तो अब भी है कश्तियां,
लेकिन जिम्मेदारियां उठाने के बहाने से,
कुछ तो अलग है,
हाँ! कुछ अलग है ये बारिश।

इसमें अल्हड़ जवानी का मज़ा नहीं,
कालेज बंक मारकर घूमने वाला मौका नहीं,
भीगी हुई इतराती लड़कियों की वो हया नहीं,
प्रेमी जोड़ों की एक-दूजे में खो जाने की कहानियां नहीं,
कुछ तो अलग है,
हाँ! कुछ अलग है ये बारिश।

आंगन में बैठे बुजुर्गों की वो नज़र नहीं,
माता-पिता की डांट से बचाने वाला प्रेम नहीं,
बिजली गुल हो जाने पर उनसे सुनने वाले किस्से नहीं,
कीचड़ में खेल कर आने पर, पड़ने वाली प्यार भरी चमाट नहीं,

कुछ तो अलग है इस बारिश में,
अब पहले जैसी बात नहीं,
या मैं अलग हो गया हूँ,
क्योंकि, जिंदगी अब पहले जैसी नहीं।

अवधूत चिंतन श्री गुरूदेव दत्त।