जूनागढ़ किल्ला | बीकानेर
पत्थर! बड़े ही कठोर होते है ये पत्थर.
कितना कुछ देख लेते है? कितना कुछ सह लेते है? बिना किसी शिकायत के.
ख़ामोशी से चीखें सुन लेते है, रक्तपात देख लेते है.
किसी की जीत, तो किसी की हार
किसी की ख़ुशी, तो किसी के ग़म को अपना लेते है.
सदियों से यही चलता आया है और चलता रहेगा.
लेकिन ये पत्थर! हाँ, ये पत्थर.. कभी विचलित नहीं होते.
खड़े है स्थिर, अपनी नींव जमा कर.
क्या इन्हें भी ख़ुशी होती होगी? दुःख होता होगा?
नहीं..ऐसा कैसे हो सकता है? ये पत्थर तो अजीव होते है.
ये कैसे अपनी भावनाएं प्रकट कर सकते है?
लेकिन..ख़ुद टूट कर ये संसार को सजीव कर जाते है.
तो क्या यह उनकी भावना नहीं है?
यदि है..तो फिर ये कुछ कहते क्यों नहीं? या कहना नहीं चाहते?
ना जाने क्यों ये पत्थर बड़े ही कठोर होते है..
श्री गुरुदेव दत्त....