Thursday, December 31, 2015

अलविदा वर्ष-२०१५, स्वागत वर्ष-2016.

वक़्त के गलियारे से होते हुए "वर्ष २०१५" भी गुज़र गया.अब सामने आ चुका "वर्ष २०१६" का बरामदा दिख रहा है.गलियारे से गुज़रते हुए इस वर्ष को कभी अंधियारे मिले,तो कभी रौशनी भी मिली.कुछ दुःख मिले तो कुछ खुशियां भी मिली.कभी पत्थरों की ठोकरें मिली तो कभी मुलायम गलीचा भी मिला.कुछ नया पाया और कुछ पुराना खोया.अपनी मुश्किलों में उलझ कर जाने - अनजाने ही कितनों का दिल दुखाया.इसके लिए मेरी ओर से क्षमा की याचना.कई सारी गलतियां की.मेरी गलतियों को क्षमा करने के लिए ज्ञात-अज्ञात सभी लोगों को धन्यवाद.गलियारे के आखिरी छोर पर खड़े होकर, जब मै पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो आँखों से पानी की बूँदें टपक पड़ती है.कुछ "बूदें" ख़ुशी की, तो कुछ गम की.ये बूँदें ही मेरा "अनुभव" है जो इस वर्ष ने मुझे दिया है.इन्हीं "बूंदों" को हथेली की कटोरी में समेट कर चलते जाना है,क्यूंकि यही ज़िन्दगी है.


अब वक़्त आ चुका है वर्ष २०१६ के स्वागत का.
इसलिए अलविदा वर्ष २०१५.
नए वर्ष की सभी को शुभकामनाएं.



श्री गुरुदेव दत्त....  

मेरे ख्वाब।

कल तक जो ख़्वाब मेरे थे, आज बेगाने हो गए.
मैंने भी पूछा, क्या हुई मुझसे खता जो मुझे छोड़ गए.
ज़वाब मिला मुझे ऐसा कि मेरे ज़ख्म फिर हरे हो गए.
मैंने भी कह दिया ख्वाबों से, जाओ तुम्हारे दिन ख़त्म हो गए.
अब ख़्वाब ना देखने की क़सम खायी है.
जाने कितने दिनों से आँखों में नींद ना आई है.
अब तो मेरा अक़्स भी साथ छोड़ चला है.
कब तक ज़िंदा रहेगा ये राही किसको पता है

Friday, December 25, 2015

मेरे सपनों का घर।

कोंकण के किसी गाँव में एक छोटा सा घर बनाना चाहता हूँ, जिसमें कवेलू वाली छत हो.एक आँगन हो जो गाय के गोबर से लीपा हुआ हो.आँगन में तुलसी कुण्ड और एक नीम का पेड़ हो.कुछ ही दूर पहाड़ की तराई और बहती नदी हो.आसपास खेत खलिहान हो.बहती नदी के पानी की कल- कल करती आवाज़ सुनाई देती हो.बारिश के मौसम में बादलों से ढका आकाश और चारों ओर हरियाली की चादर फैली हो.बरामदे में बैठ चाय-पकौड़े का मज़ा हो.बस यही मेरी दुनिया हो....


श्री गुरुदेव दत्त....

Sunday, December 20, 2015

ज़िंदगी.. एक सफ़रनामा

ज़िंदगी एक सफ़रनामा है....

अठखेलियों से भरे बचपन का..
किशोरावस्था की नादानियों का..
मस्ती में डूबे यौवन का..
ज़िम्मेदारियों से बंधे अधेड़पन का..
मजबूरियों वाले बुढ़ापे का..

ज़िन्दगी एक सफ़रनामा है ....ज़िंदगी जीने का ....

श्री गुरुदेव दत्त....

Friday, December 11, 2015

मणिपाल के दिन.

करीब ४ वर्षों बाद दोस्तों के साथ मणिपाल जा रहा हूँ.खंडवा से मंगला सुपर फ़ास्ट एक्सप्रेस की स्लीपर बोगी में.ट्रेन कल रात करीब डेढ़ बजे उडुपी पहुंचेगी.ट्रेन अभी भुसावल जंक्शन पर खड़ी है.भुसावल में डोसा अच्छा मिलता है.खैर खाना खा चूका था,तो पेट में और कुछ ठूसने की जगह नहीं थी, सो चाय पी ली.बोगी की बत्तियां बुझ चुकी थी.मेरे दोस्त ब्भी घोड़े बेचकर सो रहे थे.एक-दो छोटे बच्चे, जो रो रहे थे,को छोड़कर बाकी सब लोग सो चुके है.मैं ऊपर वाली बर्थ पर लेटा हुआ हूँ.कमबख्त नींद आ नहीं रही और उस पर मेरी पड़ोस वाली बर्थ पर सोया हुआ अधेड़ ज़ोरों से खर्राटे मार रहा है.अब करुँ क्या?मैंने अपना बैग टटोला.उसमें मेरा ४ बार पढ़ा हुआ उपन्यास "वैशाली की नगरवधू" मिल गया.वाह! क्या बात है?अब इस रात का साथी यही उपन्यास है.एकाएक मुझे एहसास हुआ कि मैं ज़ोर-ज़ोर से हिल रहा हूँ.देखा तो मेरा दोस्त मुझे जगाने की कोशिश कर रहा था.सुबह हो गयी थी.पनवेल स्टेशन आ चुका था.दांत मांजे ही थे कि, अभिषेक ने मेरे हाथ में वडापाव थमा दिया.पनवेल, बोले तो मुंबई का उपनगरीय शहर.और मुंबई बोले तो - वडापाव.वडापाव खाने के बाद २ कप चाय.हो गया नाश्ता.पनवेल से कोंकण रेलवे शुरू हो जाता है.हरियाली से भरपूर सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला.हलकी बारिश भी हो रही थी.मानसून में कोंकण रेलवे से सफर करना एक शानदार अनुभव है.दोपहर के खाने का आर्डर देकर मैं,अभिषेक और विनय ट्रेन के गेट पर खड़े हो गए.और फिर बीते किस्सों का सिलसिला शुरू हो गया.खाना कब आ गया हमारी बर्थ पर, पता ही नहीं चला.दोपहर के करीब एक बजे अमित ने हमें आवाज़ देकर बुलाया.खाने में वेज बिरयानी थी.रोटी तो अच्छी मिलती नहीं.इसलिए बिरयानी से ही काम चलाना पड़ता है.भोजन के बाद चाय की बारी आ गयी.थोड़ी से गपशप के बाद मैं फिर सो गया.शाम को नींद खुली तो ट्रेन थिवीम पहुंच रही थी.बोले तो गोवा आ गया था.नदी पर बने रेलवे पुल से थिवीम शाम को बड़ा ही सुन्दर दिखता है.रंगीन रोशनियों का अक्स नदी के पानी को रंगीन बना जाता है.थोड़ी ही देर में रात का खाना भी आ जाता है.भोजन के बाद की चाय के बाद मैं फिर अपना उपन्यास लेकर बैठ जाता हूँ.बाकी दोस्त उनकी बातों में मशगूल हो जाते है.तभी पता चलता है कि अतिश हैदराबाद और नीलाक्ष बैंगलोर से सीधे उडुपी पहुंच रहे है.एक हलकी सी मुस्कान मेरे चेहरे पर आ गयी.फिर पढ़ते-पढ़ते कब नींद लग जाती है,पता ही नहीं चलता.सुबह मेरी नींद एक अंग्रेजी बैंड "मेटालिका" के एक गाने से खुलती है.मैं खुद को अपने कमरे में पाता हूँ.आँखे मलते हुए मैं सोचता हूँ,मैं तो ट्रेन में था.कमरे में कैसे आ गया? ओह! तो मेरा मणिपाल जाना सिर्फ एक ख़्वाब था.काश....यह हक़ीक़त होता.

Missing Manipal days....
श्री गुरुदेव दत्त....

Wednesday, December 9, 2015

दुनिया के रंग ज़िन्दगी के संग.

ये दुनिया बड़े ही अजीब रंग दिखाती है,
कभी नफ़रत तो कभी प्यार सिखाती है,
कभी दूरियां तो कभी नज़दीकियाँ लाती है,
कभी अपनों को बेगाना तो कभी बेगानों को अपना बना जाती है,
कभी खुशियों का दिन तो कभी गम की रात दिखाती है,
कभी सपनों का बुनना तो कभी टूटना सिखाती है,
लेकिन दुनिया के रंगों को अपना बना लो तो ज़िन्दगी सतरंगी बन जाती है....

Tuesday, December 8, 2015

ज्योतिष का बाज़ारीकरण.

कल की ही बात है.मेरे दोस्त की माँ को उनके ज्योतिषी ने बताया कि यदि इसकी(मेरे दोस्त की) शादी अप्रैल तक नहीं हुई तो उसके २-३ वर्ष बाद योग आएगा.फिर क्या?हड़बड़ी और गलतफमियों के बीच  माताजी ने लगे हाथ एक लड़की वालों को बुला लिया घर पर, जब कि वो लड़की मेरे दोस्त को पसंद नहीं थी.मजबूरन उसे उस लड़की से मिलना पड़ा.लेकिन बात नहीं बनी.और फिर कुछ समय के लिए माहौल तनावपूर्ण हो गया.

ये हालात मेरे दोस्त के घर के ही नहीं, बल्कि ऐसे बहुत से परिवारों के है जो "ज्योतिष" पर या "ज्योतिषियों" पर "अन्धविश्वास" रखते है.

ज्योतिष का मुझे बहुत ही अल्प है,लेकिन मैं मानता हूँ कि ज्योतिष एक "विज्ञानं" है जो भविष्य में होने वाली घटनाओं की कुछ हद तक गणना कर सकता है.कुछ अनुमान सही हो सकते है और कुछ गलत भी.इसलिए इस पर "अंध" विश्वास नहीं किया जा सकता.ज्योतिष आपका "मार्गदर्शन" तो कर सकता है, परन्तु एक निश्चित "समाधान" कुछ हद तक ही दे सकता है.

लेकिंन आज इस पुरातन विद्या का बाज़ारीकरण हो चुका है.हर गल्ली में आज आपको ज्योतिष की एक "दुकान" मिल जाएगी.टीवी पर रोज़ आपको नये नये उपाय बताते "दुकानदार" मिल जायेंगे.वो भी उन समस्याओं का उपाय जो "समस्या" है ही नहीं.पैसा कमाना ही इनका उद्देश्य है."मंगल और शनि " तो इनके "हथियार" है.अगर इंसान किसी भी तरह झांसे में न आये तो मंगल और शनि का डर दिखा दो.इससे भी काम न हो तो "पितृदोष" और "कालसर्प योग" बता दो.बस हो गया काम.

हालाँकि अभी भी कई ज्योतिषी ऐसे है जो निःस्वार्थ इस विद्या का उपयोग समाज की भलाई के लिये कर रहे है.लेकिन ज्योतिष के "दुकानदारों" के कारण लोग इन पर विश्वास करने से हिचकते है..इस विद्या का उपयोग समाज की भलाई की लिये हो, इसके लिये इसका बाज़ारीकरण रोकना होगा.एक डॉक्टर को प्रैक्टिस चालू करने से पहले "डिग्री" की आवश्यकता होती है.यही नियम "ज्योतिषी" पर भी लागू होना चाहिये,ताकि "ज्योतिष" और "ज्योतिषी" दोनों को "विश्वसनीय" बनाया जा सके.



श्री गुरुदेव दत्त....

Friday, December 4, 2015

असहिष्णुता आखिर है क्या?

आजकल "असहिष्णुता" पर कुछ लोगों द्वारा बड़े ही "बोल-बच्चन" दिए जा रहे है.ये ऐसे लोग है, जिन्हें शायद ही कभी किसी वस्तु की "कमी" हुई हो या कभी किसी बात का "वास्तविक" रूप से "विरोध" करना पड़ा हो.ऐसे लोगों को असहिष्णुता का केवल "शाब्दिक अर्थ" ही पता है.वास्तव में इन्होंने कभी असहिष्णुता का "अनुभव" किया ही नहीं. असहिष्णुता क्या होती है?ये समझने और जानने के लिए इन्हें भारत भ्रमण करना होगा.अरे पूरा देश ही छोड़ो, ये लोग जिस शहर या गाँव में रहते है, एक बार वही ठीक से देख लें.

एक बार ज़रा स्लम एरियाज में जाकर देखें.गरीबी और गन्दगी होने के बावजूद वहां लोग कितने सहिष्णु है.
एक बार उस औरत के घर जाकर देखें, जहाँ वो रोज़ दहेज़ की मांग से प्रताड़ित होकर भी सहिष्णु रहती है.
एक बार उस गरीब किसान की टूटी-फूटी झोपडी में जाकर देखें,जहाँ सूखे की मार से फसल ख़राब होने के कारण वो अपने परिवार को दो वक़्त की रोटी नहीं खिला पा रहा है.फिर भी वो सहिष्णु है.

ऐसे कितने ही लोग है देश में, जो कठिन परिस्थितियों में "सहिष्णुता" से रह रहे है.और कुछ लोग बोल रहे है कि देश में "असहिष्णुता" है.

रही बात धार्मिक "असहिष्णुता" की, तो दिवाली,होली,रमज़ान,क्रिसमस,गुरुनानक जयंती आदि त्यौहारों पर देश के लोगों का "भाई-चारा" साबित कर देता है कि हमारा देश "कल" भी "सहिष्णु" था, आज भी है और हमेशा रहेगा.

श्री गुरुदेव दत्त....

Wednesday, December 2, 2015

कहाँ गए वो खेल के मैदान ?

शाम को सोसाइटी के गार्डन में रोज़ बच्चों को खेलता देखता हूँ.उन्हें खेलता देख अपने "बचपन" की याद आ जाती है.यहाँ उनके लिए एक छोटा सी जगह बना रखी है खेलने के लिए.लेकिन क्या करें?बचपन तो "उन्मुक्त" होता है.कितनी भी जगह दे दो, छोटी ही पड़ती है.अपने बचपन में हम लोग मैदानों में खेल करते थे.शहर के बीचो-बीच रामबाग में रहता था.आसपास करीब ३ या ४ मैदान थे.जब मन किया खेलने पहुंच गए.जो खेलना चाहा खेल लिए.समय की कोई चिंता नहीं.ना ही चोट लगने का कोई गम.खैर घर पर देरी से आने पर आई-बाबा की डांट ज़रूर खानी पड़ती थी.लेकिन वो भी सह लेते थे.
मेरे पहले स्कूल "सरस्वती शिशु मंदिर" में एक बड़ा सा मैदान था.आरएसएस द्वारा संचालित स्कूल  होने के कारण खेल कूद पर बहुत ध्यान दिया जाता था.देसी खेलों के साथ क्रिकेट भी खेलते थे.नौवीं क्लास से स्कूल बदला."बाल निकेतन" में आया.यहाँ हमारे पास बड़ा मैदान तो नहीं था, लेकिन इतनी जगह थी कि वह दौड़-भाग की जा सके.यहाँ हमारा १०-१२ दोस्तों का समूह था.जितनी जगह थी, उसी में हम लुका-छिपी, नदी-पहाड़, गधामार, और ना जाने क्या-क्या खेल लेते थे.उस समय इंडोर गेम्स के नाम पर बैडमिंटन , टेबल टेनिस , कैरम आदि हुआ करते थे.
आज शहरों में इंडोर गेम्स का चलन ज्यादा हो चला है.पूल,स्नूकर और भी बहुत कुछ.देखा गया है कि आउटडोर गेम्स जैसे क्रिकेट, हॉकी या फुटबॉल में ज़्यादातर छोटे शहरों या गॉव के बच्चे प्रसिद्धि पा रहे है.कारण शायद एक ही है.बड़े शहरों में मैदानों का घटना.इमारतें और पुल बनते जा रहे है.और बच्चों के खेलने की जगह सिमटती जा रही है.यदि ऐसा ही चलता रहा तो शायद एक दिन मैदान खत्म हो जायेंगे, बच्चों का खेल ख़त्म हो जायेगा और शायब "बचपन" भी.

श्री गुरुदेव दत्त....