Monday, February 29, 2016

वो बचपन था..


बचपन था वो..

थोड़ा चंचल,थोड़ा गंभीर.
अपनी ही धुन में रहने वाला,
मस्तमौला फ़क़ीर सा.

बारिश के मौसम में,
सड़क पर बहते पानी में,
छप-छप करते खुद भीग जाता,
लेकिन अपनी कागज़ की कश्ती को ज़रूर बचाता.

एक पल सपना देखता आसमाँ में जहाज उड़ाने का,
दूजे पल दौड़ते हुए किसी पहिये को डंडी से रफ़्तार दे देता.

रंग-रूप का उसे कोई लिहाज़ ना था,
रुपये-पैसे का कोई कामकाज ना था.

ना दुनिया को कोई फ़िकर,
ना रिवाज़ों का डर.
रिश्ते-नाते तो केवल नाम ही थे उसके लिए,
उसे तो बस प्रेम ही चाहिए था इस जहाँ के लिए.

क्यूंकि वो बचपन था..



श्री गुरुदेव दत्त....









Thursday, February 25, 2016

किराये की साइकिल.


किराये की साइकिल -

गर्मी की छुट्टियां शुरू हो चुकी थी.हर बार की तरह, राजू इस बार भी अपने काका के यहाँ गया.काका के छोटे लड़के के साथ उसकी खूब जमती थी.वो राजू से करीब ७-८ साल बड़ा था.वो जहाँ भी जाता,राजू उसके साथ हो लेता.वो भी राजू को कभी मना नहीं करता.दोनों में बड़ा ही प्रेम था.एक दिन राजू का भाई क्रिकेट खेलने गया.राजू भी पीछे-पीछे मैदान पहुंच गया.राजू की उम्र ८ बर्ष की थी.उम्र में छोटा होने के कारण वो एक कोना पकड़ कर बैठ गया और अपने भाई का खेल देखने लगा.मैदान में काफी सारे बच्चे खेल रहे थे.कोई क्रिकेट तो कोई फुटबॉल खेल रहा था.तभी राजू ने एक बच्चे को देखा जो साइकिल चलाना सीख़ रहा था.राजू के मन में भी साइकिल चलाने की इच्छा हुई.पहले वो ३ पहिये वाली साइकिल चला चूका था.खैर, देखते ही देखते शाम हो गयी और वो अपने भाई के साथ घर को निकल पड़ा.रस्ते में उसने अपने भाई से कहा: " भैया मुझे आपकी साइकिल चलानी है."
बड़ा भाई उसकी बात सुनकर हंस  पड़ा और कहा: "तू अभी छोटा है,मेरी साइकिल कैसे चलाएगा?यह बड़ी है."
राजू ने कहा:" फिर मुझे बड़ी साइकिल खरीद दो."
बड़े भाई ने कहा: " जब तू मेरी उम्र का हो जायेगा,तब तुझे साइकिल खरीद दूंगा."
अब बच्चे तो बच्चे होते है.राजू जिद करने लगा.बड़े भाई ने समझाया: "अगर साइकिल ख़राब हो गयी तो क्या करेगा?तू ठीक तो कर पायेगा नहीं.अभी साइकिल खरीदना सही नहीं है."
फिर भी राजू जिद पर अड़ा रहा.
बड़े भाई ने कहा:" अच्छा ठीक है.अभी साइकिल खरीद तो नहीं सकते.किराये पर ले सकते है.उसे तू चला लेना."
राजू खुश हो गया.और इस बात पर राज़ी हो गया.
अगले दिन राजू सुबह जल्दी उठ गया और भाई को भी उठाया.बिना नहाये ही दोनों "किराये की साइकिल" लेने निकल पड़े.
बड़े भाई ने मोल-भाव करके राजू को एक साइकिल दिलवा दी.एक दिन का किराया ३ रुपये.राजू बड़ा खुश हुआ.उसने ३ दिन तक खूब साइकिल चलाई.अब साइकिल वापिस करने का समय था.सो बड़े भाई के साथ निकल पड़ा.रास्ते में उसकी साइकिल की चेन उतर गयी.
वो बड़े भाई से बोला:" भैया साइकिल की चेन उतर गयी है.आप वापिस चढ़ा दो."
बड़े भाई ने हँसते हुए कहा:" साइकिल तेरी है,चेन भी तू ही चढ़ा."
राजू : "लेकिन भैया मुझे साइकिल की चेन चढ़ाते नहीं आती."
बड़े भाई ने कहा: " मैंने पहले ही तुझे समझाया था,लेकिन तू नहीं मना.अब साइकिल को हाथ में पकड़ कर चल."
राजू गुस्सा हो गया.और साइकिल हाथ में ले घसीटने लगा.कुछ ही देर में साइकिल की दुकान आ गयी.दुकानदार ने राजू से कहा:" क्यों बेटा, चला ली साइकिल?"
राजू : "हाँ."
दुकानदार: "तो फिर साइकिल घसीट कर क्यों ल रहे हो?"
राजू गुस्से में: "चेन उतर गयी."
दुकानदार:" तो चढ़ा लेते."
राजू: "नहीं आती."
दुकानदार मुस्कुराते हुए : " तो फिर इधर आओ,हम चढ़ा देते है."
दुकानदार ने एक झटके में चेन चढ़ा दी.
राजू: " भैया मुझे भी चेन चढ़ाना सीखा दो न."
दुकानदार: "पहले आप वादा करो कि, कभी ज़िद नहीं करोगे.और अपने से बड़ों कि बात मानोगे."
राजू: " हाँ, ठीक है."
दुकानदार ने राजू को चेन चढ़ाना सीखा दिया और कहा:" बेटा, किसी भी चीज़ इस्तेमाल करते हो, तो उसे सम्भालना और उसका ध्यान रखते आना चाहिए."
राजू: "जी भैया,मैं समझ गया."
तभी राजू के बड़े भाई ने राजू से कहा: " अब घर चलें?आज खाने में आम का रस और पूरी बना है."
राजू ख़ुशी से : " आमरस और पूरी!, जल्दी चलो."
दोनों भाई घर की ओर चल पड़े.राजू रास्तेभर "किराये की साइकिल" के बारे में सोचता रहा.

यहाँ सब बिकता है..

यहाँ क्या नहीं बिकता?
यहाँ सब बिकता है.जी हाँ!

जाति के नाम पर आरक्षण बिकता है,
वोट के नाम पर समाज बिकता है,
धर्म के नाम पर पाखंड बिकता है,
शिक्षा के नाम पर विद्या बिकती है,
कला के नाम पर कलाकार बिकता है,
मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता बिकती है,
सेक्स के नाम पर देह बिकती है,
शादी के नाम पर लड़का/लड़की बिकते है,
टीआरपी के नाम पर समाचार बिकता है,
विकास के नाम पर भूमि बिकती है,
राजनीति के नाम पर जनता बिकती है,
ज़िन्दगी के नाम पर खून बिकता है,
इंसानियत के नाम पर इंसान बिकता है,

देश ना हुआ, बनिये की दुकान हो गयी,क्यूंकि यहाँ सब कुछ बिकता है.



श्री गुरुदेव दत्त....


Wednesday, February 24, 2016

आँसूं..

सूर्यास्त होने को कुछ समय था,
भीड़-भाड़ वाला नर्मदा तट था,
कश्तियाँ किनारे पर आने लगी थी,
लोगों की टोलियां घर जाने लगी थी,
तट पर एक छोटा सा मंदिर था,
मंदिर के पास ही मैं तन्हा बैठा था,
शांत, शीतल जल को देख रहा था,
अपनी उदासी का जल में बने अक्स को देख रहा था,
देखते-देखते यादों में खो गया,
सुख-दुःख का हर पल याद आ गया,
हर किसी के सवालों के जवाब दिए,
सुख-दुःख में उनके आंसुओं को सहारे दिए,
मेरे भी कुछ सवाल है,
जिनका लेना मुझे जवाब है,
लेकिन यहाँ कोई ऐसा नहीं,
जो मेरे सवालों का जवाब दे सके,
अपने कंधे पर मेरे आंसुओं को बहा सके,
इसलिए,हे नर्मदे, मैं आया हूँ तेरी शरण में,
बहा ले मेरे आँसुंओं को अपने जल में,
और कर दे हल्का मेरे इस मन को....



श्री गुरुदेव दत्त....