देर शाम वह घर पहुंचा था। दीपावली की छुट्टियां थी। मुम्बई में एक बड़ी मल्टी नेशनल कंपनी में जॉब करता था। माता-पिता ने बड़ी खुशी से उसका स्वागत किया। उनका बेटा बड़े महीनों बाद घर आया था। चाय पीते हुए उसे घर के कामों और साफ-सफाई की लिस्ट थमा दी गयी। लड़के ने अनमने मन से वो लिस्ट देख भर ली। रात का खाना खाकर वो सो गया, माँ से कह कर कि, सुबह जल्दी उठा देना, घर की सफाई करनी है। सुबह के 9 बज चुके थे और लड़का अभी तक सो ही रहा था। माँ ने चार बार आवाज़ देकर उठाया। लड़का झल्ला कर उठा। मुँह धोकर चाय पीने लगा, तब देखा कि पिताजी तो काम पर लग चुके थे। अब लड़का भी काम करने के ये तैयार हो गया। घर के स्टोर रूम की सफाई शुरू कर दी। लड़के ने पिता से कहा, " क्या इतनी पुरानी चीज़ें संभाल कर रखी है? फेंको ये सब। कुछ काम की नहीं।" पिता ने कहा, "अरे उसमें हार्डवेयर का कुछ सामान है और भी कुछ कीमती चीज़ें है। एक बार देख लेना।" लड़का कहता है, " मुझे कुछ नहीं पता, मैं सब रद्दी में फेंक रहा हूँ।" कह कर फिर सफाई में लग गया। अचानक उसकी आंखें चमक उठी। उसे उसकी पुरानी बंदूक दिखी, जिससे वह बचपन मे दीपावली में खेलता था। साथ ही एक तसवीर भी दिखाई दी, जिसमें वह और उसकी बहन बंदूक एक दूसरे पर बंदूक ताने हुए खड़े दिख रहे थे। फिर उसे एक पुरानी ड्रिल मशीन दिखाई दी। घर की दीवारों में छेद ना हो पाने की वजह से पिताजी ड्रिल मशीन का प्रयोग किया करते थे। उसने वो मशीन पिताजी को दिखाई। पिताजी ने कहा, " बेटा, इसी से हमने यह घर संवारा है।" अब लड़के को उन पुरानी चीज़ों में रुचि आने लगी। बहुत सारी चीज़ें उसने अलग निकाल कर रख दी। और फिर सामान फेंकने चला गया। पिताजी के मन कुछ मसोस कर रह गए। अगले दिन दीपावली थी। उसने और बहन ने मिल कर पूजन की सारी तैयारी की और माता-पिता को बुलाया। पिताजी ने जब पूजा घर देखा तो उनके चेहरे पे हल्की सी मुस्कान आ गयी। पूजा घर में वही कुछ पुरानी चीजें साफ करके लड़के ने एक ओर रख दी थी। लड़के को देख पिताजी ने कहा, " बेटा, ये कबाड़ नहीं, यादें है। इन्हें का कभी मत छोड़ना। ये तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ेंगी।"
अवधूत चिन्तन श्री गुरुदेव दत्त।
