सूर्यास्त होने को कुछ समय था,
भीड़-भाड़ वाला नर्मदा तट था,
कश्तियाँ किनारे पर आने लगी थी,
लोगों की टोलियां घर जाने लगी थी,
तट पर एक छोटा सा मंदिर था,
मंदिर के पास ही मैं तन्हा बैठा था,
शांत, शीतल जल को देख रहा था,
अपनी उदासी का जल में बने अक्स को देख रहा था,
देखते-देखते यादों में खो गया,
सुख-दुःख का हर पल याद आ गया,
हर किसी के सवालों के जवाब दिए,
सुख-दुःख में उनके आंसुओं को सहारे दिए,
मेरे भी कुछ सवाल है,
जिनका लेना मुझे जवाब है,
लेकिन यहाँ कोई ऐसा नहीं,
जो मेरे सवालों का जवाब दे सके,
अपने कंधे पर मेरे आंसुओं को बहा सके,
इसलिए,हे नर्मदे, मैं आया हूँ तेरी शरण में,
बहा ले मेरे आँसुंओं को अपने जल में,
और कर दे हल्का मेरे इस मन को....
श्री गुरुदेव दत्त....
भीड़-भाड़ वाला नर्मदा तट था,
कश्तियाँ किनारे पर आने लगी थी,
लोगों की टोलियां घर जाने लगी थी,
तट पर एक छोटा सा मंदिर था,
मंदिर के पास ही मैं तन्हा बैठा था,
शांत, शीतल जल को देख रहा था,
अपनी उदासी का जल में बने अक्स को देख रहा था,
देखते-देखते यादों में खो गया,
सुख-दुःख का हर पल याद आ गया,
हर किसी के सवालों के जवाब दिए,
सुख-दुःख में उनके आंसुओं को सहारे दिए,
मेरे भी कुछ सवाल है,
जिनका लेना मुझे जवाब है,
लेकिन यहाँ कोई ऐसा नहीं,
जो मेरे सवालों का जवाब दे सके,
अपने कंधे पर मेरे आंसुओं को बहा सके,
इसलिए,हे नर्मदे, मैं आया हूँ तेरी शरण में,
बहा ले मेरे आँसुंओं को अपने जल में,
और कर दे हल्का मेरे इस मन को....
श्री गुरुदेव दत्त....
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