संसार में कोई भी वस्तु नग्न नहीं होती.प्रत्येक वस्तु पर एक आवरण चढ़ा होता है.आवरण के बिना वस्तु का अस्तित्व नहीं हो सकता.आत्मा और धर्म का सम्बन्ध भी मुझे कुछ ऐसा ही लगता है.जहाँ, आत्मा वस्तु है और धर्म आवरण.देह का आवरण अर्थात वस्त्र जब मलिन हो जाता है, तब उसे रसायनों से स्वच्छ पड़ता है.ठीक उसी तरह, आत्मा का आवरण अर्थात धर्म जब मलिन हो जाता है, तब उसे भी स्वच्छ करना पड़ता है.धर्म रूपी वस्त्र को कर्म-रूपी रसायन से स्वच्छ करना पड़ता है.ये हमारे कर्म ही है, जो धर्म को अधर्म में और अधर्म को धर्म में परिवर्तित करते है.
श्री गुरुदेव दत्त....
श्री गुरुदेव दत्त....
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