Thursday, February 27, 2020

सूर्यकिरण..

गुलाबी ठंडउदित होता सूर्य,
मद्धम चलती हवापेड़ों के पत्तों की सरसराहट,
उसमें से छन कर आती सूर्यकिरणें,
ऊष्मा और कुछ लालिमा लिए,
अलसायी आँखों को जब छूती हैं,
हल्के कत्थई रंग की आँखें चमक उठती हैं,
जैसे कोई चमत्कार होता हैजैसे कोई स्वप्न साकार होता है,
ग्रीवा को छूती केश की लटेंकुछ ऐसे हिलती है
जैसे कोई मोरनीमोर को देख झूम उठती है,
अधरों को भी धीर कहाँउनके नीचे जो तिल छुपाउसको भी चैन कहाँ,
वो भी मुस्कुराए कुछ ऐसेजैसे कोई गुलाब कली में से खिल उठा,
क्या कहने उस सूर्यकिरण काकि उसके मात्र स्पर्श से हो जाते हैं चमत्कारऔर हो जाता है कोई स्वप्न साकार..

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