बचपन था वो..
थोड़ा चंचल,थोड़ा गंभीर.
अपनी ही धुन में रहने वाला,
मस्तमौला फ़क़ीर सा.
बारिश के मौसम में,
सड़क पर बहते पानी में,
छप-छप करते खुद भीग जाता,
लेकिन अपनी कागज़ की कश्ती को ज़रूर बचाता.
एक पल सपना देखता आसमाँ में जहाज उड़ाने का,
दूजे पल दौड़ते हुए किसी पहिये को डंडी से रफ़्तार दे देता.
रंग-रूप का उसे कोई लिहाज़ ना था,
रुपये-पैसे का कोई कामकाज ना था.
ना दुनिया को कोई फ़िकर,
ना रिवाज़ों का डर.
रिश्ते-नाते तो केवल नाम ही थे उसके लिए,
उसे तो बस प्रेम ही चाहिए था इस जहाँ के लिए.
क्यूंकि वो बचपन था..
श्री गुरुदेव दत्त....
Accha like late ho !!! Keep it up !!
ReplyDeleteThank you! :)
DeleteKhub likha hai👍👍
ReplyDeleteKhub likha hai👍👍
ReplyDeleteThanks Rashmi :)
DeleteWell written :)
DeleteWell written :)
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