यात्रा वृत्तान्त-
मधुबनी से सहरसा, १५० किलोमीटर - ६ घंटे में..
बचपन में स्कूल की परीक्षाओं में निबंध लिखने को आते थे.कोई त्यौहारों पर लिखता था,कोई सामाजिक विषयों पर, तो कोई यात्रा वृत्तान्त पर लिखता था.मुझे यात्रा वृत्तान्त पर निबंध लिखना बहुत पसंद था.मेरे आई-बाबा की कृपा से मैं बहुत सी यात्राएं कर चूका हूँ.गर्मी की छुट्टियों में आजी के पास ग्वालियर और जबलपुर जाया करता था.परिवार के साथ महाराष्ट्र-दर्शन और वैष्णो देवी जैसी यात्राएं भी की है.मुझे यात्रा करना बहुत पसंद है.शायद इसलिए मुझे कार्य(जॉब) भी ऐसा ही मिला, जिसमें यात्रा करने के अवसर भरपूर है.वैसे तो जीवन भी एक यात्रा ही है,जो प्रत्येक जीवंत प्राणी को करनी होती है.जन्म से मृत्यु तक की यात्रा.कलिंग-विजय के पश्चात् एक बौद्ध भिक्षु ने सम्राट अशोक से कहा था कि, " तुम्हारा भाग्य सम्राट से भी ऊँचा होगा.तुम्हारा भाग्य उस यात्री का होगा, जो अपनी यात्रा समाप्त कर लेता है".
क्या? यह वाक्य आपने कहीं सुना है? हाँ! हाँ! जनता हूँ. यह हिंदी फिल्म अशोका का डायलॉग है.आप भी ना! नक़ल झट से पकड़ लेते है.लेकिन, जो भी हो, उस भिक्षु ने उचित ही कहा था.
खैर छोड़िये इन दार्शनिक बातों को.बिंदु पर आते है.बिंदु! अरे भाई, वह गुज़रे ज़माने कि हिंदी फिल्मों कि अदाकारा बिंदु नहीं! पॉइंट भाई - पॉइंट पर आते है. आप लोग हर जगह हिंदी फिल्मों को घुसा देते है.चलिए कोई बात नहीं.गलती आपकी भी नहीं है.हिंदी फिल्में हम भारतीयों के रग-रग में बसी हुई है.
बस!अब बहुत हुई इधर-उधर कि बातें.अब काम कि बात करते है.हाँ! तो भाई, बात ऐसी है कि, मैं एक यात्रा वृत्तान्त लिख रहा हूँ, जो मैंने अभी दो दिन पहले ही की है.
तारीख ३० जुलाई,२०१६ को मुझे ऑफिशियल टूर पर बिहार में मधुबनी से सहरसा जाना था.करीब १५० किलोमीटर का रास्ता था.कुछ लोगों से पूछताछ करी कि, कैसे जाना है? मुझे ट्रेन से जाने की इच्छा थी.लेकिन, बिहार में बाढ़ के कारण मधुबनी से सहरसा तक का एकमात्र रेल मार्ग बंद हो चुका था.अब बस से जाने का ही एकमात्र विकल्प बचा था.मधुबनी से सहरसा तक सीधे बस भी नहीं थी.लोगों ने बताया था कि, मधुबनी से सकरी जाओ,वहां से सहरसा के लिए सीधे बस मिल जाएगी,वो भी ए सी बस.मैंने सुबह १०:३० बजे मधुबनी से सकरी के लिए बस पकड़ी.आधे घंटे में सकरी आ गया.बस से उतारते ही चार-पाँच कंडक्टरों ने मुझे घेर लिया.बोले, ढाई घंटे में सहरसा पहुँचा देंगे.मैंने मना कर दिया.मुँह में ही कुछ बड़बड़ाते हुए वो चले गए.मैं एसी बस का इंतज़ार करने लगा.१५-२० मिनट इंतज़ार करने के बाद बभी बस नहीं आयी तो सोचा लोकल ट्रांसपोर्ट कि बस में ही चला जाये.सो,चढ़ गया भाई बस में.कंडक्टर ने टिकट काटते हुए कहा कि, सिमराही तक छोड़ देंगे,फिर वहां से सहरसा की बस मिल जाएगी.मैंने कहा कि, आप तो सहरसा तक छोड़ने वाले थे. कंडक्टर मेरे प्रश्न को अनसुना करते हुए आगे बाढ़ गया.मैं भी चुपचाप बैठ गया.बिहार में कौन झगड़ा मोल ले, यही सोचकर.सिमराही तक सड़क फ़ॉर लेन थी.इसलिए कोई परेशानी नहीं हुई.करीब दो घंटे में सिमराही आ गया.दोपहर को करीब एक बजे सिमराही से सहरसा के लिए बस पकड़ी.वो भी लोकल ट्रांसपोर्ट.सिमराही से सहरसा तक का रास्ता सिंगल लेन का था और ग्रामीण क्षेत्र से होकर गुज़रता था.अब मेरे गले में आ चुकी थी." जय श्री राम " और " श्री गुरुदेव दत्त " बोल कर मैंने सफ़र कि शुरुआत करी.मुझे नहीं पता था कि, इस सफ़र में मैं कितना (Suffer) करने वाला था.बस धीरे-धीरे २५-३० की गति से चल रही थी.रास्ते में खेत-खलिहान दिख रहे थे.चारों ओर हरियाली थी.तभी अचानक बस का ब्रेक लगा.खिड़की से बहार झांक कर देखा तो पता लगा कि, कुछ भैसें बड़ी शान से नखरा दिखाते हुए सड़क पार कर रही थी.क्यों ना करे भाई? यह ग्रामीण क्षेत्र है.और वैसे भी लालू यादव को भैसों से बड़ा लगाव है.तो फिर कोई भैसों से पंगा क्यों ले? भैसों के सड़क पार करते ही बस फिर चल पड़ी.हर पाँच-दस मिनट में सवारी बैठाने के लिए बस के ब्रेक लग जाते थे.बस कि सीट भी गज़ब थी.पिचकी हुई.फोम पिचककर पत्थर हो चुका था.पिछवाड़ा भी अब जलन करने लगा था.बावन सवारी कि क्षमता वाली बस में अस्सी यात्री भरे पड़े थे.सब एक-दूसरे में घुसे पड़े थे.सामान अलग बिखरा पड़ा था.ऊपर से बिहार कि धूल-मिटटी से भरी सड़कें.ना चाहते हुए भी इंसान आधा किलो मिटटी खा जाता है.साथ ही साथ, ग्रामीणों की मदमस्त कर देने वाली पसीने कि ख़ुशबू.वाह! क्या सफर (Suffer) है? अभी आधा रास्ता तय हुआ ही था कि बस फिर रुक गयी.इस बार बस का टायर पंक्चर हो गया था.मतलब सोने पे सुहाग.खैर, इसी बहाने पिछवाड़े को थोड़ा आराम तो मिला.१५-२० मिनट पंक्चर ठीक होने में लग गए.ठीक होते ही बस फिर चल पड़ी.धीरे-धीरे रेंगते हुए आखिर दोपहर के ४:३० बजे सहरसा बस स्टैंड पहुँच ही गई.
इस सफ़र में मुझे इतना तो समझ में आ ही गया कि, कभी-कभी हमें ख़ुद को किस्मत के भरोसे छोड़ देना होता है.यह किस्मत का ही करम था, जिसने मुझे बिहार के ग्रामीण क्षेत्र के नज़ारे देखने का मौका दिया.
साथ ही साथ इस "कुशल" को सकुशल सहरसा पहुँचा दिया.देर आए, दुरुस्त आए.
श्री गुरुदेव दत्त....
मधुबनी से सहरसा, १५० किलोमीटर - ६ घंटे में..
बचपन में स्कूल की परीक्षाओं में निबंध लिखने को आते थे.कोई त्यौहारों पर लिखता था,कोई सामाजिक विषयों पर, तो कोई यात्रा वृत्तान्त पर लिखता था.मुझे यात्रा वृत्तान्त पर निबंध लिखना बहुत पसंद था.मेरे आई-बाबा की कृपा से मैं बहुत सी यात्राएं कर चूका हूँ.गर्मी की छुट्टियों में आजी के पास ग्वालियर और जबलपुर जाया करता था.परिवार के साथ महाराष्ट्र-दर्शन और वैष्णो देवी जैसी यात्राएं भी की है.मुझे यात्रा करना बहुत पसंद है.शायद इसलिए मुझे कार्य(जॉब) भी ऐसा ही मिला, जिसमें यात्रा करने के अवसर भरपूर है.वैसे तो जीवन भी एक यात्रा ही है,जो प्रत्येक जीवंत प्राणी को करनी होती है.जन्म से मृत्यु तक की यात्रा.कलिंग-विजय के पश्चात् एक बौद्ध भिक्षु ने सम्राट अशोक से कहा था कि, " तुम्हारा भाग्य सम्राट से भी ऊँचा होगा.तुम्हारा भाग्य उस यात्री का होगा, जो अपनी यात्रा समाप्त कर लेता है".
क्या? यह वाक्य आपने कहीं सुना है? हाँ! हाँ! जनता हूँ. यह हिंदी फिल्म अशोका का डायलॉग है.आप भी ना! नक़ल झट से पकड़ लेते है.लेकिन, जो भी हो, उस भिक्षु ने उचित ही कहा था.
खैर छोड़िये इन दार्शनिक बातों को.बिंदु पर आते है.बिंदु! अरे भाई, वह गुज़रे ज़माने कि हिंदी फिल्मों कि अदाकारा बिंदु नहीं! पॉइंट भाई - पॉइंट पर आते है. आप लोग हर जगह हिंदी फिल्मों को घुसा देते है.चलिए कोई बात नहीं.गलती आपकी भी नहीं है.हिंदी फिल्में हम भारतीयों के रग-रग में बसी हुई है.
बस!अब बहुत हुई इधर-उधर कि बातें.अब काम कि बात करते है.हाँ! तो भाई, बात ऐसी है कि, मैं एक यात्रा वृत्तान्त लिख रहा हूँ, जो मैंने अभी दो दिन पहले ही की है.
तारीख ३० जुलाई,२०१६ को मुझे ऑफिशियल टूर पर बिहार में मधुबनी से सहरसा जाना था.करीब १५० किलोमीटर का रास्ता था.कुछ लोगों से पूछताछ करी कि, कैसे जाना है? मुझे ट्रेन से जाने की इच्छा थी.लेकिन, बिहार में बाढ़ के कारण मधुबनी से सहरसा तक का एकमात्र रेल मार्ग बंद हो चुका था.अब बस से जाने का ही एकमात्र विकल्प बचा था.मधुबनी से सहरसा तक सीधे बस भी नहीं थी.लोगों ने बताया था कि, मधुबनी से सकरी जाओ,वहां से सहरसा के लिए सीधे बस मिल जाएगी,वो भी ए सी बस.मैंने सुबह १०:३० बजे मधुबनी से सकरी के लिए बस पकड़ी.आधे घंटे में सकरी आ गया.बस से उतारते ही चार-पाँच कंडक्टरों ने मुझे घेर लिया.बोले, ढाई घंटे में सहरसा पहुँचा देंगे.मैंने मना कर दिया.मुँह में ही कुछ बड़बड़ाते हुए वो चले गए.मैं एसी बस का इंतज़ार करने लगा.१५-२० मिनट इंतज़ार करने के बाद बभी बस नहीं आयी तो सोचा लोकल ट्रांसपोर्ट कि बस में ही चला जाये.सो,चढ़ गया भाई बस में.कंडक्टर ने टिकट काटते हुए कहा कि, सिमराही तक छोड़ देंगे,फिर वहां से सहरसा की बस मिल जाएगी.मैंने कहा कि, आप तो सहरसा तक छोड़ने वाले थे. कंडक्टर मेरे प्रश्न को अनसुना करते हुए आगे बाढ़ गया.मैं भी चुपचाप बैठ गया.बिहार में कौन झगड़ा मोल ले, यही सोचकर.सिमराही तक सड़क फ़ॉर लेन थी.इसलिए कोई परेशानी नहीं हुई.करीब दो घंटे में सिमराही आ गया.दोपहर को करीब एक बजे सिमराही से सहरसा के लिए बस पकड़ी.वो भी लोकल ट्रांसपोर्ट.सिमराही से सहरसा तक का रास्ता सिंगल लेन का था और ग्रामीण क्षेत्र से होकर गुज़रता था.अब मेरे गले में आ चुकी थी." जय श्री राम " और " श्री गुरुदेव दत्त " बोल कर मैंने सफ़र कि शुरुआत करी.मुझे नहीं पता था कि, इस सफ़र में मैं कितना (Suffer) करने वाला था.बस धीरे-धीरे २५-३० की गति से चल रही थी.रास्ते में खेत-खलिहान दिख रहे थे.चारों ओर हरियाली थी.तभी अचानक बस का ब्रेक लगा.खिड़की से बहार झांक कर देखा तो पता लगा कि, कुछ भैसें बड़ी शान से नखरा दिखाते हुए सड़क पार कर रही थी.क्यों ना करे भाई? यह ग्रामीण क्षेत्र है.और वैसे भी लालू यादव को भैसों से बड़ा लगाव है.तो फिर कोई भैसों से पंगा क्यों ले? भैसों के सड़क पार करते ही बस फिर चल पड़ी.हर पाँच-दस मिनट में सवारी बैठाने के लिए बस के ब्रेक लग जाते थे.बस कि सीट भी गज़ब थी.पिचकी हुई.फोम पिचककर पत्थर हो चुका था.पिछवाड़ा भी अब जलन करने लगा था.बावन सवारी कि क्षमता वाली बस में अस्सी यात्री भरे पड़े थे.सब एक-दूसरे में घुसे पड़े थे.सामान अलग बिखरा पड़ा था.ऊपर से बिहार कि धूल-मिटटी से भरी सड़कें.ना चाहते हुए भी इंसान आधा किलो मिटटी खा जाता है.साथ ही साथ, ग्रामीणों की मदमस्त कर देने वाली पसीने कि ख़ुशबू.वाह! क्या सफर (Suffer) है? अभी आधा रास्ता तय हुआ ही था कि बस फिर रुक गयी.इस बार बस का टायर पंक्चर हो गया था.मतलब सोने पे सुहाग.खैर, इसी बहाने पिछवाड़े को थोड़ा आराम तो मिला.१५-२० मिनट पंक्चर ठीक होने में लग गए.ठीक होते ही बस फिर चल पड़ी.धीरे-धीरे रेंगते हुए आखिर दोपहर के ४:३० बजे सहरसा बस स्टैंड पहुँच ही गई.
इस सफ़र में मुझे इतना तो समझ में आ ही गया कि, कभी-कभी हमें ख़ुद को किस्मत के भरोसे छोड़ देना होता है.यह किस्मत का ही करम था, जिसने मुझे बिहार के ग्रामीण क्षेत्र के नज़ारे देखने का मौका दिया.
साथ ही साथ इस "कुशल" को सकुशल सहरसा पहुँचा दिया.देर आए, दुरुस्त आए.
श्री गुरुदेव दत्त....
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