करीब २० वर्षों बाद फिर से हिमालय की गोद में आया हूँ.बचपन में परिवार सहित वैष्णो देवी और उत्तराखंड की यात्रा की थी.कुछ-कुछ यादें अब भी ज़हन में है.देहरादून से मसूरी जाते वक़्त रास्ते में एक नदी लगती है.शायद गंगा ही थी.तब आई, बाबा और आजी, तीनों नहाने चले गए.मुझे और मेरी बहन को बस में ही छोड़ गए थे.मुझे भी नहाना था.नदी के पानी में खेलना था, मस्ती करनी थी.लेकिन मैं ठहरा छोटा.लेकिन नदी में उतरने की धुन सवार थी.सो, बस का दरवाज़ा खोलने की कोशिश करने लगा.शरीर में जितनी भी ताक़त थी, लगा कर दरवाज़े को धक्का लगाया.एक ही धक्के में दरवाज़ा खुला और मैं बस के बाहर नीचे सड़क पर सर के बल गिर पड़ा.कुछ गुलांटियां खाते हुए नदी की मुंडेर से जा टकराया.मेरी बहन ज़ोर से चिल्लाई और आई,बाबा एवं आजी भागते हुए आये.शुक्र है उस मुंडेर का जो मुझे बचा लिया.फिर मैंने नदी में जाने का विचार छोड़ दिया.ख़ैर, हिमालय ने मुझे सबक़ सीखा दिया था.
मैं जहाँ भी रहा हूँ, पहाड़ मेरे आसपास ही रहे है.इंदौर, मेरा जन्मस्थान, वो भी विंध्याचल की पहाड़ियों से घिरा हुआ है.मणिपाल और पुणे, सह्याद्रि श्रृंखला से घिरा हुआ है.
मुझे पहाड़ों से प्यार है.और शायद, पहाड़ों को भी मुझसे.
इसलिए मुझे हमेशा अपनी गोद में बसाये रखते है.
श्री गुरुदेव दत्त....
मैं जहाँ भी रहा हूँ, पहाड़ मेरे आसपास ही रहे है.इंदौर, मेरा जन्मस्थान, वो भी विंध्याचल की पहाड़ियों से घिरा हुआ है.मणिपाल और पुणे, सह्याद्रि श्रृंखला से घिरा हुआ है.
मुझे पहाड़ों से प्यार है.और शायद, पहाड़ों को भी मुझसे.
इसलिए मुझे हमेशा अपनी गोद में बसाये रखते है.
श्री गुरुदेव दत्त....
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