कल रात मेरे सपनों के संसार के दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी.दरवाज़ा खोल कर देखा तो एक छोटा १०-१२ वर्ष का बच्चा दिखा.मैंने पूछा, तुम कौन हो?कोई उत्तर नहीं मिला.वो मुड़कर बाहर की ओर चल दिया.उत्सुकतावश मैं भी उसके पीछे चल दिया.कुछ देर बाद वो बच्चा एक घर के सामने जाकर रुक गया.फिर मैंने उससे पूछा: तुम मुझे ये कहाँ ले आये हो?परन्तु वो फिर बिना कोई उत्तर दिये एक तरफ भाग गया.उसे ढूंढने की कोशिश की, पर वो नहीं दिखा.अब मैंने उस घर की तरफ देखा, जहाँ वो रुक गया था.वो घर किसी सरकारी कॉलोनी का लग रहा था.एक छोटा सा मुख्य दरवाज़ा था, जो लकड़ी का था.थोड़ा टुटा-फूटा, लेकिन काम-चलाऊ.दरवाज़े पर एक बड़ा सा नीम का पेड़ था.दरवाज़े से अंदर घुसते ही गाय के गोबर से लीपा हुआ एक बड़ा सा आँगन.घर कुछ जाना-पहचाना सा लगा.अरे! ये तो वही घर है, जहाँ मेरा बचपन गुज़रा है.हाँ! इस घर में मेरे बड़े काका रहते थे.ये घर है H-35, जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय की रिहायशी कॉलोनी का.मेरे काका कृषि विश्वविद्यालय में कार्यरत थे.छुट्टियों में मैं यहाँ आया करता था.इसी आँगन में मैं अपने भाई-बहनों के साथ खेला करता था.मेरी आजी(दादी) के साथ गोबर से आँगन लीपा करता था.इसी आँगन में लगे जामफल के पेड़ के जामों को तोड़ कर खाया करता था.आजी को बागबानी का बहुत शौक था.आँगन में ही कई तरह की सब्जियां और फूलों के पौधे लगे थे.घर के पीछे की तरफ जामुन का एक पेड़ था.उसी के जामुन खाकर जीभ जामुनी हो जाती थी.त्योहारों के समय जब सारे रिश्तेदार आया करते थे,तब इसी घर के आँगन में बैठ गप्पे लड़ाया करते थे.कुछ ही पलों में, इस घर में बीता हर एक पल आँखों के सामने आ गया.वहाँ से वापिस जाने का मन ही नहीं हुआ.लेकिन वापस तो जाना था.तो निकल पड़ा मैं अपने सपनों के संसार से बाहर.वापिस लौटते हुए मुझे वही बच्चा फिर दिखा.शायद वो मेरा "बचपन" ही था.
किसी भी इंसान वो घर सबसे प्यारा होता है जहाँ उसने अपना बचपन गुज़ारा होता है.आज भी मन करता है उस घर में रहने का,उस आँगन में खेलने का.लेकिन अब यह संभव नहीं.फिर भी अगर मौका मिले तो पल भर के लिये उस घर को देखना बस भर चाहता हूँ.शायद ये मेरा "बचपना" ही है.
श्री गुरुदेव दत्त....
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