नारी केवल एक "देह" नहीं है.वो केवल "आत्मा" भी नहीं है.नारी एक "शक्ति" है, "ऊर्जा" है.हर मनुष्य को जीने के लिए "शक्ति" की आवश्यकता होती है.मनुष्य क्या? "शिव शंकर" को भी जीने के लिए "शक्ति" की आवश्यकता थी.फिर मनुष्य की क्या बात है? नारी वही "शक्ति" है.ज़रूरी नहीं कि जीने के लिए नारी का केवल "पत्नी-स्वरुप" ही हो.वो किसी भी रूप में हो सकती है.एक माँ, एक बहिन या बहू.
इसी "नारी" स्वरुप शक्ति को "प्राप्त" करने के लिए सदियों से कई पुरुषों ने अनगिनत युद्ध भी किये.उनका हश्र क्या हुआ, ये इतिहास में दर्ज़ है.पुरुष सदा से नारी-शक्ति "ग्रहण" करने कि अभिलाषा मन में लिया फिरता रहा है.लेकिन कभी उसने "नारी" से "शक्ति" ग्रहण करने का प्रयास नहीं किया.नारी से शक्ति ग्रहण करने के लिए प्रथम पुरुषों को नारी को समझना पड़ेगा.नारी कोई रहस्य या पहेली नहीं है.उसे समझने के लिए "नर" को "नारायण" बनने का प्रयास करना पड़ेगा.और यह तब संभव होगा, जब "पुरुष" अपने "पुरुषार्थ" का "सदुपयोग" करना सीखेगा.
सनातन-हिन्दू धर्म में ही नहीं, संसार के सभी धर्मों में नारी को पूजा गया है.परन्तु एक ओर तो हम उसकी "पूजा" करते है और दूसरी ओर "दूजा" समझ उसका अपमान भी करते है, उस पर अत्याचार करते है.
श्रीकृष्ण ने उनका संपूर्ण जीवन "नारी" को उसके अधिकार दिलवाने की लड़ाई लड़ने में समर्पित कर दिया.श्रीकृष्ण से अच्छा कोई "नारी" को समझ नहीं पाया.हम श्रीकृष्ण तो नहीं बन सकते.परन्तु हाँ ! उनके बताये हुए उपदेशों को व्यव्हार में लाने का प्रयास तो कर ही सकते है.
नारी को "अबला" से "सबला" बनाने में "नर" और "नारी", दोनों को ही उचित और आवश्यक कर्म करना होगा.
श्री गुरुदेव दत्त....
इसी "नारी" स्वरुप शक्ति को "प्राप्त" करने के लिए सदियों से कई पुरुषों ने अनगिनत युद्ध भी किये.उनका हश्र क्या हुआ, ये इतिहास में दर्ज़ है.पुरुष सदा से नारी-शक्ति "ग्रहण" करने कि अभिलाषा मन में लिया फिरता रहा है.लेकिन कभी उसने "नारी" से "शक्ति" ग्रहण करने का प्रयास नहीं किया.नारी से शक्ति ग्रहण करने के लिए प्रथम पुरुषों को नारी को समझना पड़ेगा.नारी कोई रहस्य या पहेली नहीं है.उसे समझने के लिए "नर" को "नारायण" बनने का प्रयास करना पड़ेगा.और यह तब संभव होगा, जब "पुरुष" अपने "पुरुषार्थ" का "सदुपयोग" करना सीखेगा.
सनातन-हिन्दू धर्म में ही नहीं, संसार के सभी धर्मों में नारी को पूजा गया है.परन्तु एक ओर तो हम उसकी "पूजा" करते है और दूसरी ओर "दूजा" समझ उसका अपमान भी करते है, उस पर अत्याचार करते है.
श्रीकृष्ण ने उनका संपूर्ण जीवन "नारी" को उसके अधिकार दिलवाने की लड़ाई लड़ने में समर्पित कर दिया.श्रीकृष्ण से अच्छा कोई "नारी" को समझ नहीं पाया.हम श्रीकृष्ण तो नहीं बन सकते.परन्तु हाँ ! उनके बताये हुए उपदेशों को व्यव्हार में लाने का प्रयास तो कर ही सकते है.
नारी को "अबला" से "सबला" बनाने में "नर" और "नारी", दोनों को ही उचित और आवश्यक कर्म करना होगा.
श्री गुरुदेव दत्त....
Mast👌👌
ReplyDelete@Rashmi Thanks :)
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