एक नन्हीं सी कोपल (नवजात शिशु) फूटी है झाड़ियों (समाज) के बीच कहीं,
देखो, बचाना इसे कीटों (बलात्कारी) से,
टूट कर बिखर ना जाए ये कहीं,
भर देंगी जिंदगी तुम्हारी अनेक रंगों से,
ग़र संभाल सको इन्हें अपने दिलों में कहीं।
अवधूत चिंतन श्री गुरूदेव दत्त।
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