मासूम आंखें -
छायाचित्र - मालिनी भट
खिड़की से झांकती ये मासूम आंखें,
कभी शरारती, तो कभी शरमाती,
कभी नम, तो कभी गुस्सैल,
बहुत कुछ संजों कर रखती है,
अपनी सपनों की दुनिया में,
हर ओर देखती है उत्सुकता से,
खोजती है है अपनापन हर जीव में,
समा लेती है, थोड़ी ख़ुशी और थोड़ा गम,
कभी थोड़ा रो कर, तो थोड़ा मुस्करा कर,
हर पल तैयार रहती है कुछ नया देखने को,
रहना चाहती है सदा हर चीज़ परखने को,
कह जाती है ज़माने से बहुत कुछ पलकें झपका कर,
सह जाती है सब कुछ बिना एक शब्द कहे,
अदम्य शक्ति है, साहस है इन आँखों में,
एक आँख और चाहिए इन्हे पहचानने को,
रहने दो इन्हें ज़िंदा; करने दो हर हसरत पूरी,
देश का भविष्य है ये; बहुत कीमती है ये मासूम आँखें..
अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त....

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