Thursday, July 13, 2017

कुछ अलग है ये बारिश या मैं!

सावन का आगाज़ हो चुका है,
बारिश की झड़ी शुरू हो चुकी है,
पानी की बौछारें वार कर रही है,
जो सूखी ज़मीन को सूकून दे रही है,
लेकिन इस मन का क्या करूं,
इसे अभी भी सूकून नहीं,
कुछ तो अलग है,
हांँ! कुछ अलग है ये बारिश।

इस बारिश में बचपन की वो मस्ती नहीं,
जो किसी मैदान या छत पर भीगने में थी,
गलियों में बहते पानी में काग़ज़ की कश्ती तैराने में थी,
भीगते तो अब भी है सड़कों पर,
लेकिन बाइक पर आफिस से घर जाने की जल्दी में,
तैरती तो अब भी है कश्तियां,
लेकिन जिम्मेदारियां उठाने के बहाने से,
कुछ तो अलग है,
हाँ! कुछ अलग है ये बारिश।

इसमें अल्हड़ जवानी का मज़ा नहीं,
कालेज बंक मारकर घूमने वाला मौका नहीं,
भीगी हुई इतराती लड़कियों की वो हया नहीं,
प्रेमी जोड़ों की एक-दूजे में खो जाने की कहानियां नहीं,
कुछ तो अलग है,
हाँ! कुछ अलग है ये बारिश।

आंगन में बैठे बुजुर्गों की वो नज़र नहीं,
माता-पिता की डांट से बचाने वाला प्रेम नहीं,
बिजली गुल हो जाने पर उनसे सुनने वाले किस्से नहीं,
कीचड़ में खेल कर आने पर, पड़ने वाली प्यार भरी चमाट नहीं,

कुछ तो अलग है इस बारिश में,
अब पहले जैसी बात नहीं,
या मैं अलग हो गया हूँ,
क्योंकि, जिंदगी अब पहले जैसी नहीं।

अवधूत चिंतन श्री गुरूदेव दत्त।

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