Friday, December 11, 2015

मणिपाल के दिन.

करीब ४ वर्षों बाद दोस्तों के साथ मणिपाल जा रहा हूँ.खंडवा से मंगला सुपर फ़ास्ट एक्सप्रेस की स्लीपर बोगी में.ट्रेन कल रात करीब डेढ़ बजे उडुपी पहुंचेगी.ट्रेन अभी भुसावल जंक्शन पर खड़ी है.भुसावल में डोसा अच्छा मिलता है.खैर खाना खा चूका था,तो पेट में और कुछ ठूसने की जगह नहीं थी, सो चाय पी ली.बोगी की बत्तियां बुझ चुकी थी.मेरे दोस्त ब्भी घोड़े बेचकर सो रहे थे.एक-दो छोटे बच्चे, जो रो रहे थे,को छोड़कर बाकी सब लोग सो चुके है.मैं ऊपर वाली बर्थ पर लेटा हुआ हूँ.कमबख्त नींद आ नहीं रही और उस पर मेरी पड़ोस वाली बर्थ पर सोया हुआ अधेड़ ज़ोरों से खर्राटे मार रहा है.अब करुँ क्या?मैंने अपना बैग टटोला.उसमें मेरा ४ बार पढ़ा हुआ उपन्यास "वैशाली की नगरवधू" मिल गया.वाह! क्या बात है?अब इस रात का साथी यही उपन्यास है.एकाएक मुझे एहसास हुआ कि मैं ज़ोर-ज़ोर से हिल रहा हूँ.देखा तो मेरा दोस्त मुझे जगाने की कोशिश कर रहा था.सुबह हो गयी थी.पनवेल स्टेशन आ चुका था.दांत मांजे ही थे कि, अभिषेक ने मेरे हाथ में वडापाव थमा दिया.पनवेल, बोले तो मुंबई का उपनगरीय शहर.और मुंबई बोले तो - वडापाव.वडापाव खाने के बाद २ कप चाय.हो गया नाश्ता.पनवेल से कोंकण रेलवे शुरू हो जाता है.हरियाली से भरपूर सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला.हलकी बारिश भी हो रही थी.मानसून में कोंकण रेलवे से सफर करना एक शानदार अनुभव है.दोपहर के खाने का आर्डर देकर मैं,अभिषेक और विनय ट्रेन के गेट पर खड़े हो गए.और फिर बीते किस्सों का सिलसिला शुरू हो गया.खाना कब आ गया हमारी बर्थ पर, पता ही नहीं चला.दोपहर के करीब एक बजे अमित ने हमें आवाज़ देकर बुलाया.खाने में वेज बिरयानी थी.रोटी तो अच्छी मिलती नहीं.इसलिए बिरयानी से ही काम चलाना पड़ता है.भोजन के बाद चाय की बारी आ गयी.थोड़ी से गपशप के बाद मैं फिर सो गया.शाम को नींद खुली तो ट्रेन थिवीम पहुंच रही थी.बोले तो गोवा आ गया था.नदी पर बने रेलवे पुल से थिवीम शाम को बड़ा ही सुन्दर दिखता है.रंगीन रोशनियों का अक्स नदी के पानी को रंगीन बना जाता है.थोड़ी ही देर में रात का खाना भी आ जाता है.भोजन के बाद की चाय के बाद मैं फिर अपना उपन्यास लेकर बैठ जाता हूँ.बाकी दोस्त उनकी बातों में मशगूल हो जाते है.तभी पता चलता है कि अतिश हैदराबाद और नीलाक्ष बैंगलोर से सीधे उडुपी पहुंच रहे है.एक हलकी सी मुस्कान मेरे चेहरे पर आ गयी.फिर पढ़ते-पढ़ते कब नींद लग जाती है,पता ही नहीं चलता.सुबह मेरी नींद एक अंग्रेजी बैंड "मेटालिका" के एक गाने से खुलती है.मैं खुद को अपने कमरे में पाता हूँ.आँखे मलते हुए मैं सोचता हूँ,मैं तो ट्रेन में था.कमरे में कैसे आ गया? ओह! तो मेरा मणिपाल जाना सिर्फ एक ख़्वाब था.काश....यह हक़ीक़त होता.

Missing Manipal days....
श्री गुरुदेव दत्त....

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