Thursday, December 31, 2015

मेरे ख्वाब।

कल तक जो ख़्वाब मेरे थे, आज बेगाने हो गए.
मैंने भी पूछा, क्या हुई मुझसे खता जो मुझे छोड़ गए.
ज़वाब मिला मुझे ऐसा कि मेरे ज़ख्म फिर हरे हो गए.
मैंने भी कह दिया ख्वाबों से, जाओ तुम्हारे दिन ख़त्म हो गए.
अब ख़्वाब ना देखने की क़सम खायी है.
जाने कितने दिनों से आँखों में नींद ना आई है.
अब तो मेरा अक़्स भी साथ छोड़ चला है.
कब तक ज़िंदा रहेगा ये राही किसको पता है

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