शाम को सोसाइटी के गार्डन में रोज़ बच्चों को खेलता देखता हूँ.उन्हें खेलता देख अपने "बचपन" की याद आ जाती है.यहाँ उनके लिए एक छोटा सी जगह बना रखी है खेलने के लिए.लेकिन क्या करें?बचपन तो "उन्मुक्त" होता है.कितनी भी जगह दे दो, छोटी ही पड़ती है.अपने बचपन में हम लोग मैदानों में खेल करते थे.शहर के बीचो-बीच रामबाग में रहता था.आसपास करीब ३ या ४ मैदान थे.जब मन किया खेलने पहुंच गए.जो खेलना चाहा खेल लिए.समय की कोई चिंता नहीं.ना ही चोट लगने का कोई गम.खैर घर पर देरी से आने पर आई-बाबा की डांट ज़रूर खानी पड़ती थी.लेकिन वो भी सह लेते थे.
मेरे पहले स्कूल "सरस्वती शिशु मंदिर" में एक बड़ा सा मैदान था.आरएसएस द्वारा संचालित स्कूल होने के कारण खेल कूद पर बहुत ध्यान दिया जाता था.देसी खेलों के साथ क्रिकेट भी खेलते थे.नौवीं क्लास से स्कूल बदला."बाल निकेतन" में आया.यहाँ हमारे पास बड़ा मैदान तो नहीं था, लेकिन इतनी जगह थी कि वह दौड़-भाग की जा सके.यहाँ हमारा १०-१२ दोस्तों का समूह था.जितनी जगह थी, उसी में हम लुका-छिपी, नदी-पहाड़, गधामार, और ना जाने क्या-क्या खेल लेते थे.उस समय इंडोर गेम्स के नाम पर बैडमिंटन , टेबल टेनिस , कैरम आदि हुआ करते थे.
आज शहरों में इंडोर गेम्स का चलन ज्यादा हो चला है.पूल,स्नूकर और भी बहुत कुछ.देखा गया है कि आउटडोर गेम्स जैसे क्रिकेट, हॉकी या फुटबॉल में ज़्यादातर छोटे शहरों या गॉव के बच्चे प्रसिद्धि पा रहे है.कारण शायद एक ही है.बड़े शहरों में मैदानों का घटना.इमारतें और पुल बनते जा रहे है.और बच्चों के खेलने की जगह सिमटती जा रही है.यदि ऐसा ही चलता रहा तो शायद एक दिन मैदान खत्म हो जायेंगे, बच्चों का खेल ख़त्म हो जायेगा और शायब "बचपन" भी.
श्री गुरुदेव दत्त....
मेरे पहले स्कूल "सरस्वती शिशु मंदिर" में एक बड़ा सा मैदान था.आरएसएस द्वारा संचालित स्कूल होने के कारण खेल कूद पर बहुत ध्यान दिया जाता था.देसी खेलों के साथ क्रिकेट भी खेलते थे.नौवीं क्लास से स्कूल बदला."बाल निकेतन" में आया.यहाँ हमारे पास बड़ा मैदान तो नहीं था, लेकिन इतनी जगह थी कि वह दौड़-भाग की जा सके.यहाँ हमारा १०-१२ दोस्तों का समूह था.जितनी जगह थी, उसी में हम लुका-छिपी, नदी-पहाड़, गधामार, और ना जाने क्या-क्या खेल लेते थे.उस समय इंडोर गेम्स के नाम पर बैडमिंटन , टेबल टेनिस , कैरम आदि हुआ करते थे.
आज शहरों में इंडोर गेम्स का चलन ज्यादा हो चला है.पूल,स्नूकर और भी बहुत कुछ.देखा गया है कि आउटडोर गेम्स जैसे क्रिकेट, हॉकी या फुटबॉल में ज़्यादातर छोटे शहरों या गॉव के बच्चे प्रसिद्धि पा रहे है.कारण शायद एक ही है.बड़े शहरों में मैदानों का घटना.इमारतें और पुल बनते जा रहे है.और बच्चों के खेलने की जगह सिमटती जा रही है.यदि ऐसा ही चलता रहा तो शायद एक दिन मैदान खत्म हो जायेंगे, बच्चों का खेल ख़त्म हो जायेगा और शायब "बचपन" भी.
श्री गुरुदेव दत्त....
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